ओल चिकि एक लेखन प्रणाली नहीं, बल्कि संताली भाषा और संस्कृति की पहचान का प्रतीक है


किसी भी समृद्ध समाज की पहचान उसकी भाषा साहित्य एवं संस्कृति से होता हैं. जो समाज जितना अधिक उन्नतशील है,उसकी संस्कृतिक विरासत भी उतनी ही गौरवशाली है. इतिहास सदियों से  गवाह रहा है, कि समृद्ध भाषा साहित्य एवं लेखन का विकास विना लिपि के संभव नहीं है. निश्चित रूप से आपके मन में यह सवाल उठता होगा कि  आखिर मनुष्य को लिपि की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके सटीक जवाब में हम कह सकते हैं, लिपि के प्रयोग से मनुष्य अपने भावों एवं विचारों को  प्रकट एवं संरक्षित करने  के उद्देश्य से हैं. लिपि के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा को स्थायित्व प्रदान प्रदान करती है. देश में आज़ादी के बाद इससे आधार मानकर संविधान में अनुसूची भाषाएं को एक भाषा -एक लिपि को मानक मानते हुए संविधान के आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं शामिल किया गया. आमतौर पर इन भारतीय भाषाओं का लगातार साहित्य एवं संस्कृति का विकास कर रही है. हल ही के समय में झारखंड प्रदेश में संताली भाषा के ओल चिकि लिपि लेकर एक नई बहस, आन्दोलन, प्रदर्शन और संघर्ष का सिलसिला शुरू हुआ है. आईए जानते हैं इसके पीछे का इतिहास क्या है ? भारत जब अंग्रेज का उपनिवेशक बना, तब देश भर में  शिक्षा में सुधार करते  हुए लार्ड मैकाले को लोक शिक्षा समिति का सभापति नियुक्त किया था. उन्होंने भारतीय विद्यालयों में अंग्रेजी को शिक्षा  का माध्यम बना दिया. अब जल्दी ही भारतीय मूल विद्यालयों में शिक्षा की प्रमुख भाषा अंग्रेजी बन गई. ताकि आधुनिक शिक्षा प्रणाली के द्वारा देश के मेरुदंड अर्थात् आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत को तोड़ा जा सके. उन्होंने भारतीय भाषाओं को अविकसित और बेकार बताते हुए अपमान किया, फलस्वरूप भाषाओं का विकास रुक गई. इनमें संताली भाषा भी शामिल थी. आज़ादी के पश्चात् भारतीय संविधान में अंग्रेजी को सिर्फ 15 वर्ष तक कामकाज की भाषा के रूप में प्रयोग के लिए स्वीकृत मिली थी. 1947 में, स्वतंत्रता के बाद यह देखा गया कि आर्थिक विकास लाने के लिए नए भारतीय राज्यों स्थापना करना आवश्यक हो गया था. इसके अलावा,भाषाई विशेषताओं के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करने की योजना बनाई गई.  ताकि आर्थिक विकास के साथ-साथ समान संस्कृति वाले क्षेत्रों में गतिविधियों को सरल बनाने के लिए गया था. 


                                    परन्तु इस मामले में झारखंड हमेशा से पिछड़ता रहा है. राज्य में  आदिवासियों की बहुलता है, कमोबेश यहां  की संस्कृति एवं परम्पराओं प्रकृति के इशारे पर नियंत्रित है, जो  अलिखित परम्पराओं के संवाहक के रूप प्रतिबिम्बित करते हैं.  बदले समय को देखते हुए लोगों को यह महसूस हो रहा कि इन्हें अब  लिपिबद्ध करने की जरूरत है. इस उद्देश्य को  सफलता तब मिलेगी जब  राज्य  के प्राथमिक विद्यालयों में माध्यम मातृभाषा को बनाया जाय. इस दृष्टिकोण से राज्य सरकार के शिक्षा नीति में स्थानीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के लिपि को मान्यता देते हुए पाठ्यचर्या सुनिश्चित कर इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350ए प्राथमिक विद्यालय पर स्तर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा देने की प्रावधान हैं. मातृभाषा में शिक्षा का अर्थ है, कि स्कुली शिक्षा  में उस भाषा का उपयोग किया जाए, जिसे बच्चे जन्म के साथ बोलते हैं  या सबसे से अच्छे से जानते हैं, आमतौर पर घर पर बोली जाने okवाली भाषा. इसके कई फायदे हैं, जैसे बच्चों की समझ बेहतर होती हैं, और वे भावनात्मक रूप से अधिक सहज महसूस एवं सीख सकते हैं. , भारत में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी प्राथमिक रूप स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की वकालत करते है. इससे जमीनी स्तर पर लागू करवाने के लिए झारखंड नामधारी आदिवासी सामाजिक संगठन, बुद्धिजीवी एवं कार्यकर्ता द्वारा सरकार पर दबाव डाल सकते हैं.

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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