बिरजिया आदिम जनजाति: जंगल जिनके जीने का आधार है।




झारखण्ड देश के जनजातीय समुदायों के राज्यों के रुप में  प्रमुख है। प्रदेश में कुल 32 जनजाति पाये जाते हैं। इनमें कुछ जनजातियों को उनके सामाजिक एवं आर्थिक संरचनाओं के आधार पर 9 जनजाति को आदिम जनजाति के श्रेणियां में रखा गया है । बिरजिया उनमें एक है। बिरजिया आदिम जनजाति प्राचीन काल से ही जंगलों पर निर्भर रही है। इस जनजाति के ज्यादातर लोग पलामू जिले के विभिन्न प्रखंड में निवास करते हैं। इसके अलावा राजधानी रांची जिला के सुदूरवर्ती इलाकों में और गुमला जिला के विशुनपुर और रायडीह तथा लोहरदगा के सेनहा और किसको  प्रखंड में  रहते हैं। सिमडेगा जिले में भी इस समुदाय का आबादी का बसेरा है। इस आदिम  जनजाति का प्रमुख पेशा खेती ही रहा है। पहाड़ों के ऊपर पाट पर बसने वाले बिरजिया पहाड़ के ढालुओं का कुछ हिस्सा गर्मी के दिनों में साफ कर उसमें बांस की नुकीली खोनति बनाकर या लोहे के नुकीले औजार से खोदकर उसमें पहले विहन गिरा देते हैं। इसके बाद उसमें खेती-बाड़ी की जाती है। अंग्रेजों ने बर्न कल्टीवेशन कहा था। इसमें मकई, लहर, खुरसा आदि की खेती की जाती है। दो या तीन साल के बाद खेती कर जगह बदलकर खेती की जाती है। खेती के अलावा काश्तकारी में भी बिरजिया जनजाति के लोगों की रुचि रही है। बढ़ईगिरी मैं भी बिरजिया लोगों ने बड़े पैमाने  में निपुण हैं।  चूंकि यह जनजाति जंगलों के काफी करीब रहती है। इस लिहाज से जंगलों से प्रर्याप्त मात्रा में लकड़ी उपलब्ध हो जाती है। लकड़ी का समान बनाकर अपने उपयोग में लाते और बेचते भी है। इससे आर्थिक मदद भी मिल जाती है। बांस के काम में भी बिरजिया को काफी निपुण माना जाता है। बांस के सामान में बांस की छतरी, बांस की टोकरी, जिससे खजिया कहते हैं। ये सारे कार्य करने में बिरजिया औरतें भी काफी कुशल मानी जाती है। औरतें जंगलों से गुंगु पत्ते लाकर छतरी भी बनाती है। जिसको गुंगु कहा जाता है। बरसात में चाहे कितना बरस जाय, लेकिन इससे पानी का पार होना मुश्किल होता है। पहले बिरजिया के लोग काफी शिकार किया करते थे। लेकिन अब इसमें कमी आती है। जंगल से लाह,मधु,मोम वगैरह भी लाकर ये इस्तेमाल किया करते हैं।अब तो खेती के काम में ही ज्यादातर लोग लगे हुए हैं। सरकार ने इनकी उत्थान के लिए अनेक योजनाएं शुरू की है। जिसमें  आदिम जनजाति के लोगों को सरकारी में सीधी नियुक्ति की करने का प्रावधान है । 

 कालीदास मुर्मू, सम्पादक, आदिवासी परिचर्चा, जमशेदपुर।

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