श्री तिर्की ने केंद्रीय मंत्री का ध्यान इस तथ्य की ओर आकृष्ट कराया कि परिसीमन की प्रक्रिया में यदि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों के वर्तमान अनुपात की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो इससे झारखंड सहित अन्य राज्यों में आदिवासी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी प्रभावित हो सकती है.
उन्होंने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 330(2) एवं 332(3) में आवश्यक संशोधन करने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का वर्तमान अनुपात सुरक्षित रहना चाहिए. यदि परिसीमन के बाद सदन की कुल सीटों की संख्या बढ़ती है, तो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में वृद्धि सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि आदिवासी समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर न हो.
पाँच राज्यों के लिए प्रस्तावित प्रावधानों के अनुरूप झारखंड को भी संरक्षण मिले:
श्री तिर्की ने कहा कि प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 (विधेयक संख्या 107) में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा के संदर्भ में विशेष प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे. ऐसे में झारखंड सहित अन्य पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों के आदिवासी समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा के लिए भी समान प्रकृति के प्रभावी संवैधानिक एवं विधायी प्रावधान किए जाने चाहिए.
उन्होंने कहा कि पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों की ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए परिसीमन संबंधी कानून में स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है. इस विषय पर किसी भी विधायी पहल में आदिवासी समुदाय के अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को समुचित महत्व दिया जाना चाहिए.
2007 की परिसीमन प्रक्रिया में विशेष परिस्थित के कारण झारखंड को परिसीमन से अलग रखा गया था:
श्री तिर्की ने वर्ष 2007 की परिसीमन प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय झारखंड विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 28 से घटाकर 22 तथा लोकसभा में 5 से घटाकर 4 करने का प्रस्ताव सामने आया था. जिसके बाद पूरे राज्य में आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन हुआ था. हालांकि, संबंधित वैधानिक प्रावधानों के कारण यह कटौती लागू नहीं हो सकी. उन्होंने कहा कि इस अनुभव से स्पष्ट होता है, कि भविष्य में आदिवासी आरक्षित सीटों के अनुपात को सुरक्षित रखने के लिए स्पष्ट और प्रभावी संवैधानिक संरक्षण आवश्यक है.
राज्यपाल एवं जनजातीय सलाहकार परिषद और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका अहम् है:
ज्ञापन में यह भी मांग की गई कि परिसीमन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों में पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले राज्यों के राज्यपालों, जनजातीय सलाहकार परिषदों (TAC) तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की भूमिका को उचित महत्व दिया जाए. संविधान के अनुच्छेद 338A(9) के अनुरूप अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत विषयों पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से परामर्श सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया.
इसके अतिरिक्त, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में आवश्यक संशोधन अथवा पूरक कानूनी व्यवस्था बनाने, पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों के लिए विशेष संरक्षण सुनिश्चित करने तथा परिसीमन के आदिवासी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी रखी गई.
केंद्रीय कानून मंत्री ने लिया संज्ञान:
मुलाकात के दौरान केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने प्रस्तुत ज्ञापन और विधिक पहलुओं का गंभीर संज्ञान लिया. उन्होंने कहा कि यदि इस विषय पर किसी प्रकार के स्पष्टीकरण या अतिरिक्त जानकारी की आवश्यकता होगी, तो वे संपर्क करेंगे.
श्री तिर्की ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार परिसीमन से संबंधित आगामी विधायी एवं नीतिगत निर्णयों में आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम उठाएगी.
मुलाकात के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों में “परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान” शीर्षक रिपोर्ट तथा झारखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री शुभाशिष रसिक सोरेन और एनयूएसआरएल, राँची के सहायक प्राध्यापक श्री रामचंद्र उराँव के विधिक अभिमत भी शामिल थे.
रिपोर्ट: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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