देश के आदिवासी छात्रों की हालत पर भी कोई न्याय होगी ?


रांची: देश में आदिवासी एक ऐसा समूह है, जो निरंतर अपने हक और अधिकार को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड रहे हैं. इस तरह के समाचार आपको प्रतिदिन देश के भिन्न-भिन्न कोने से समाचार पत्र,मेन स्ट्रीम मीडिया एवं सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी आए दिन मिलती रहती होगी. आदिवासी प्राकृतिक रूप से बहुल ही शांत स्वभाव के लोग हैं. परन्तु यह अपने अस्मिता व पहचान को लेकर काफी संवेदनशील रहते है. शायद बजह रही है कि शिक्षा, रोजगार, जल जंगल व जमीन बचाने के लिए निरंतर संघर्ष  करते हुए दिखाई देते हैं. 

पिछले दिनों महाराष्ट्र से समाचार आई है कि आदिवासी छात्र अपने छात्रावास में बुनियादी सुविधाएं की मांग को लेकर नासिक से मुंबई तक करीबन 180 किमी 300 छात्र ने पदयात्रा की. छात्र राज्यपाल से मिलकर अपने बाते उनके सामने रखना चाहते थे. पुलिस प्रशासन ने राज्यपाल से मिलाने के बजाय उन्हें हिरासत में लिया गया.  क्या आदिवासी छात्रों को संवैधानिक तरीके अपने जयाज मांग रखने का अधिकार नहीं है. यह मांगों छात्रावास में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने से संबंधित थे.

आदिवासी छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए:

प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने आदिवासी छात्रावास में शिक्षा और रहने की सुविधाओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए छात्रों का कहना है कि छात्र  में पर्याप्त बजट, भोजन, पानी शौचालय और  सोने की व्यवस्था नहीं होने से विद्यार्थियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है छात्रों ने सेंट्रल किचन व्यवस्था बंद करने की मांग की थी प्रदर्शनकारी छात्रों का दवा है कि पिछले दो वर्षों में इस व्यवस्था के कारण 600 से अधिक विद्यार्थी की मौत हई है इसके अलावा आदिवासी छात्रों के अन्य  मुख्य मांगे थे.

• आदिवासी छात्रों मे लागू सेंट्रल किचन व्यवस्था बंद किया जाए. 

 • प्रदर्शनकारी  छात्रों के द्वारा आदिवासी मंत्री के इस्तीफा की मांग        की गई.

• छात्रावास को मिलने वाले डीपीटी राशि में बढ़ोतरी की जाए.

• छात्रावास में पानी टॉयलेट और बाथरूम की उचित व्यवस्था की         जाए.

• संभाजी नगर के एक छात्रावास में करीबन 200 छात्रों के लिए          केवल एक बाथरूम होने का आरोप लगाते हुए व्यवस्था सुधार की     मांग.

अब मुख्य सवाल यह है कि अगर  महाराष्ट्र जैसे आर्थिक संपन्नता वाले राज्य में आदिवासी छात्र की शिक्षा एवं उससे जुड़े मौलिक सुविधाएं से वंचित हो रहे हैं, अन्य राज्यों में इन समुदायों की छात्राओं की क्या स्थिति होगी. इसके जिम्मेदार कौन है प्रशासन या स्वयं आदिवासी समुदाय ? इसका जवाब मिलना कठिन तो है, पर उतना कठिन भी नहीं है, पर भारतीय नागरिक होने के नाते यह सारी सुविधाएं के प्रति सरकार की जबावदेही बनती है, इससे खाजिर नहीं किया जा सकता है. ऐसा रवैया रहा तो आदिवासी का विकास कैसे संभव होगा, जिसका कल्पना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आजादी के वक्त की थी.

• रिपोर्ट व संकलन: कालीदास मुर्मू संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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