हो, होड़ो, व होड़ शब्द का महत्व एवं महाद्वीपीय जुड़ाव का संस्कृतिक विश्लेषण


हो, होड़ो व होड़ क्रमश झारखंड  में निवास  करने  वाले जनजातीय समूहों हो, मुण्डारी व संताली भाषा से संबंधित शब्द है. जिसका शाब्दिक अर्थ है " मनुष्य / लोग"  हैं. हो लोग अपने को "हो", मुण्डारी लोग अपने को   " होड़ो " एवं संताली अपने को "होड़" कहते हैं. ठीक उसी प्रकार जैसे अमेरिका के मूल निवासी अपने लिए नावाहो, चेरोकी, व इनइट ( Inuit) या ईयू ( Eu)  शब्द का प्रयोग करते हैं. जिसका अर्थ भी " मनुष्य/लोग" ही हैं. यह अपने लिए ऐसे शब्दों का चयन किया है जिसमें " हम ही मनुष्य" का बोध करता है, जो इस पृथ्वी पर बतौर मूल निवासी या प्राथमिक नागरिकता का एहसास करता हो, साथ ही प्रकृति के सान्निध्य रहने वाले मनुष्य या समूहों का होना. भाले ही महाद्वीपीय अलगाव ने इन मूल निवासी को भौगोलिक क्षेत्र से काट दिए गए हैं, पर संस्कृति एवं पहचान में भिन्नता के बाबजूद सरहद में समानताएं देखी जा सकती है. जो "हम ही मानव लोग हैं" को चरितार्थ करती है.

प्रकृति से गहरा जुड़ाव:- अमेरिका व एशिया (भारत) में रहने वाले जनजातीय समूहों में साधारणतः समानताएं जो दिखाई देती है, वह प्रकृति और पर्यावरण के साथ संबंध केवल जीवित रहने का साधन नहीं है, यह एक गहरी आध्यात्मिक सांस्कृतिक और सह अस्तित्व का अटूट रिश्ता है.

जीववाद के प्रति संवेदनशील:- संस्कृति पुरी तरह से जीववाद पर आधारित है. इन समूहों का मानना है कि  प्रकृति की हर वस्तु चाहे वह पेड़-पौधों, चाहे वह कोई पशु-पक्षियों या पशु हो, चट्टान हो, सबके भीतर एक जीवित आत्मा होती है. वे प्रकृति को अपने अधीन करने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाए रहने में विश्वास करते हैं.


पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का लगाव: इन समूहों के पास पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक से स्थानांतरित होने वाले पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान (Traditional Ecological knowledge) है. जैसे आसमान और बादल देखकर मौसम का रुख़ कैसे होगा, वर्षा होगी या धूप खिलेगी? नदी के बहाव की गति के अनुरूप जल संचयन का प्रबंधन करना आदि विशेष पारंपरिक ज्ञान है. वर्तमान समय में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के दौरा में  पारंगत स्वादेशी ज्ञान का उपयोग इन समूहों द्वारा आज भी सह अस्तित्व के रूप किया जा रहा है.

पारंपरिक स्वाशासन पद्धति : मूल निवासी या आदिवासी विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित एवं मजबूतीकरण करने वाले  प्राथमिक नागरिक है. भारत के संदर्भ में देखें तो मांझी- पारगाना, पड़हा- राजा, डोकलो -सोहर व्यवस्था क्रमशः संताल, हो, मुण्डा, उरांव एवं खड़िया समूहों में आदिकाल से चली आ रही भारत की पहली गणतांत्रिक प्रणाली है. इनके नियम और कानून लिखित न होकर मौखिक परंपराओं और रुढ़ियों ( (Customery low) पर आधारित है. विना किसी आदलती खर्च के आपसी सहमति से विवादों का तुरंत समाधान किया जाता है. लोकतांत्रिक और सर्वसम्मत निर्णय आम तौर पर बहुमत या सर्वसम्मत से लिए जाते हैं, जहां गांव के बुजुर्ग की सलाह महत्व दिया जाता है. 

अमेरिका में भी आदिवासी/मुल निवासी समूहों की स्वाशासन पद्धति को जनजातीय संप्रभुता ( Tribal sovereignty) और जनजातीय स्वाशासन व्यवस्था ( Tribal self Governance)  कहा जाता है. अमेरिका में घरेलू आश्रित राष्ट्र ( Domestic dependent Nation)  इसका अर्थ है कि ये जनजातीय अमेरिका के भीतर ही अर्द्ध स्वायत्त राष्ट्र की तहत् काम करती है, और इनका केन्द्र सरकार के साथ सीधा सरकार से सरकार का संबंध होता है.

संवैधानिक संरक्षण:  भारत में पारंपरिक स्वाशासन व्यवस्थाओं को संविधान को पांचवीं अनुसूची और पेसा क़ानून इन पारंपरिक स्वाशासन पद्धति को मान्यता और मजबूती प्रदान करते हैं. इसके पुर्व ब्रिटिश शासन ने मुण्डा- मानकी व्यवस्था को कोल्हान क्षेत्र में विल्किंसन रुल के तहत् सन 1837 ई० में कानूनी मान्यता मिली थी.

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा। 

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