प्रकृति से गहरा जुड़ाव:- अमेरिका व एशिया (भारत) में रहने वाले जनजातीय समूहों में साधारणतः समानताएं जो दिखाई देती है, वह प्रकृति और पर्यावरण के साथ संबंध केवल जीवित रहने का साधन नहीं है, यह एक गहरी आध्यात्मिक सांस्कृतिक और सह अस्तित्व का अटूट रिश्ता है.
जीववाद के प्रति संवेदनशील:- संस्कृति पुरी तरह से जीववाद पर आधारित है. इन समूहों का मानना है कि प्रकृति की हर वस्तु चाहे वह पेड़-पौधों, चाहे वह कोई पशु-पक्षियों या पशु हो, चट्टान हो, सबके भीतर एक जीवित आत्मा होती है. वे प्रकृति को अपने अधीन करने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाए रहने में विश्वास करते हैं.
पारंपरिक स्वाशासन पद्धति : मूल निवासी या आदिवासी विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित एवं मजबूतीकरण करने वाले प्राथमिक नागरिक है. भारत के संदर्भ में देखें तो मांझी- पारगाना, पड़हा- राजा, डोकलो -सोहर व्यवस्था क्रमशः संताल, हो, मुण्डा, उरांव एवं खड़िया समूहों में आदिकाल से चली आ रही भारत की पहली गणतांत्रिक प्रणाली है. इनके नियम और कानून लिखित न होकर मौखिक परंपराओं और रुढ़ियों ( (Customery low) पर आधारित है. विना किसी आदलती खर्च के आपसी सहमति से विवादों का तुरंत समाधान किया जाता है. लोकतांत्रिक और सर्वसम्मत निर्णय आम तौर पर बहुमत या सर्वसम्मत से लिए जाते हैं, जहां गांव के बुजुर्ग की सलाह महत्व दिया जाता है.
अमेरिका में भी आदिवासी/मुल निवासी समूहों की स्वाशासन पद्धति को जनजातीय संप्रभुता ( Tribal sovereignty) और जनजातीय स्वाशासन व्यवस्था ( Tribal self Governance) कहा जाता है. अमेरिका में घरेलू आश्रित राष्ट्र ( Domestic dependent Nation) इसका अर्थ है कि ये जनजातीय अमेरिका के भीतर ही अर्द्ध स्वायत्त राष्ट्र की तहत् काम करती है, और इनका केन्द्र सरकार के साथ सीधा सरकार से सरकार का संबंध होता है.
संवैधानिक संरक्षण: भारत में पारंपरिक स्वाशासन व्यवस्थाओं को संविधान को पांचवीं अनुसूची और पेसा क़ानून इन पारंपरिक स्वाशासन पद्धति को मान्यता और मजबूती प्रदान करते हैं. इसके पुर्व ब्रिटिश शासन ने मुण्डा- मानकी व्यवस्था को कोल्हान क्षेत्र में विल्किंसन रुल के तहत् सन 1837 ई० में कानूनी मान्यता मिली थी.
संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।


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