समाज सुधारक एवं संताली साहित्य के महान् साहित्यकार डॉ.माझी रामदास टुडू " रासका" की संक्षिप्त जीवनी


डॉ. माझी रामदास टुडू 'रेस्का' संताली साहित्य और संस्कृति के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और महान लेखक, समाज सुधारक तथा शिक्षक थे. इनका जन्म 2 अक्टूबर 1854 को झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला अनुमंडल के अंतर्गत आने वाले कड़वाकांटा गांव में हुआ था.  इनके पिता का नाम सीताराम टुडू और माता का नाम सालगे टुडू था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिडिल क्लास तक घाटशिला स्कूल से प्राप्त की थी. वे संताली समाज में अत्यधिक पूजनीय हैं और उन्हें आदरपूर्वक 'धोरोम गुरु' (धर्मगुरु) की उपाधि से नवाजा गया है.

माझी रामदास टुडू ने संताली समुदाय के उत्थान और उनकी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में ऐतिहासिक योगदान दिया है. संताली समाज के रीति-रिवाजों, लोक परंपराओं, आध्यात्मिक विचारों और जीवन दर्शन को लिखित रूप में संकलित करने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1894 में 'खेरवाल बोंगशो धोरोम पुथी' नामक एक महान ग्रंथ की रचना की. यह पुस्तक संताल समाज के पारंपरिक धार्मिक नियमों और संस्कृति का एक बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसने मौखिक रूप से चली आ रही परंपराओं को लिपिबद्ध कर हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया. संताली साहित्य में उनके इसी अद्वितीय और अभूतपूर्व योगदान को देखते हुए वर्ष 1951 में कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित डी.लिट. (D.Lit.) की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था.

अपने सामाजिक जीवन में वे अपने गांव के 'माझी' (ग्राम प्रधान) और दामपाड़ा गाड़ के 'परगाना' जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक पदों पर रहे. इसके साथ ही, उन्होंने धालभूमगढ़ में ब्रिटिश शासन के दौरान राजस्व वसूलने (खाजना आदाय) और जमीन-जायदाद के हिसाब-किताब की जिम्मेदारी भी निभाई. वे एक गहरे आध्यात्मिक पुरुष भी थे और जनश्रुतियों के अनुसार उन्होंने आजोदिया बुरू (अयोध्या पहाड़) पर तीन से चार वर्षों तक साधु-संन्यासियों की भांति कठिन तपस्या की थी. उनका वैवाहिक जीवन दो पत्नियों, डुमनी टुडू और मालती टुडू के साथ बीता.जीवनभर संताली समाज की सेवा और साहित्य साधना करने के बाद 12 मई 1951 को उनका देहावसान हो गया. आज भी संताल समाज उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर उन्हें अपनी संस्कृति के रक्षक और मार्गदर्शक के रूप में याद कर श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

(स्रोत:  श्री शेखर टुडू)

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