अगस्त 2024 में झारखंड सरकार की त्वरित कार्रवाई: - कोर्ट के फैसले के एक हाफ्ते के भीतर 2 अगस्त 2024 को झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing land cess Act 2024 पारित किया. इसमें कोयला और लौह पर 100 प्रति टन, बाक्साइट पर 70 प्रति टन, चुना पत्थर पर और मैगनिज पर 50 रूपया प्रति टन सेस लगाया गया. जो केन्द्र सरकार के लिए अनुकूल नहीं हैं.
केन्द्र सरकार का जबावी कदम : फिर 13 अगस्त 2026 केन्द्र सरकार का जबावी कदम के रूप संसद से एम एम डी आर संशोधन विधेयक 2026 पारित किया.जो इस अधिकार को पूर्ण वापस ले लेता है. इससे जरुरी सवाल यह उठता है कि झारखंड राज्य के खनिज से आने वाले राजस्व का क्या होगा ? मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने महामहिम राष्ट्रपति को लिखे पत्र में खनिज आने वाले राशि का आंकड़े दिए हैं, जो इस प्रकार है:-
1) वर्ष -, 2024-25- 1,379 करोड़ रुपए
2) वर्ष -, 2025-26- 7,488 करोड़ रुपए
3) वर्ष - 2026-27- 13, 215 करोड़ रुपए ( अनुमान) राशि आयेगा. यानी राज्य की राजस्व तेजी से बढ़ रही थी. और एक चौंकाने वाली आंकड़े यह भी है कि झारखंड का 84.9% गैर-कर राजस्व झारखंड के खनन क्षेत्रों से आता है. यह नया कानून उस बड़े हिस्से को प्रभावित करता है.
इस संशोधन विधेयक से राज्य की कौन-सा योजनाएं खातरे में :
मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना:- इस संशोधन विधेयक से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले योजना में मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना है, इस योजना के अन्तर्गत राज्य के 50 लाख से अधिक महिलाएं लाभार्थी है, जिन्हें 2500 रुपए प्रति माह प्रति महिला को मिलती है.यह झारखंड सरकार की सबसे बड़ी और लोकप्रिय योजना है.
आबुआ आवास योजना:- यह राज्य की दुसरी सबसे बड़ा और गरीबों परिवार को पक्का मकान दिए जाने वाले योजना है. यह योजना भी संशोधित कर से प्रभावित होगा. यानी इसके लिए धन राशि में संकट आ सकते हैं. जिसका सीधा असर ग़रीबों पर पड़ेगा.
शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और पेंशन जैसे योजनाएं पर प्रभाव: सेंस से प्राप्त राशि से शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सुविधाएं जनता को उपलब्ध कराने में सरकार सक्षम होती थी। परन्तु नये कानून से सेस बंद होने पर इन मदों में खर्च करना सरकार के लिए टेड़ी खीर साबित हो सकती है. इसके अलावा ग्रामीण विकास कार्य, आदिवासी कल्याण कार्यक्रम के राशि इसी मद से खर्च किए जाते है.
इस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्पष्ट कहा है कि अगर नया कानून लागू हुआ तो इन सभी योजनाओं पर ताला बंद कर देनी होगी. यह सिर्फ सरकारी आंकड़े और योजना का सवाल नहीं है. यह झारखंड के उन जल, जंगल व जमीन से जुड़े हुए मामले है, जो यहां के आदिवासी अपने जान से अधिक मानते हैं.
झारखंड के आदिवासियों के वास्तविक स्थिति क्या है:- आप जानते होंगे कि राज्य के कुल आबादी में 26.9% यानी लगभग 27% लोग आदिवासी हैं. झारखंड देश का सबसे खनिज समृद्धि राज्य है. यहीं से देश का 40% कोयला, 25% लोहा, तथा 18% तांबा पाए जाते हैं. पर विडंबना देखिए यहां के जनजातीय आबादी देश के सबसे गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर है. खनन से विस्थापन का दर्द भी यहां सबसे अधिक है. पिछले दशकों में लाखों आदिवसी खनन से विस्थापित हुए हैं. सेस से मिलने वाली राशि इन्हें पुनर्वास, मुआवजा एवं सामाजिक विकास कार्यों में खर्च होती थी.
तत्काल इसका क्या असर होगा:- सेस की नहीं आने पर तत्काल यह असर होगा कि 50 लाख महिलाओं को मिलने वाली राशि में संकट उत्पन्न होगी. शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे बुनियादी बजट में कटौती होगी और खनन क्षेत्र के विकास कार्य प्रभावित होगी या रुकेगी. पर्यावरण, पुनर्स्थापना योजना पर भी असर पड़ेगा. विस्थापित परिवारों का पुनर्वास भी धीमा होगा.
दीर्घ कालीन असर पड़ेगा:- राज्य के वित्तीय स्वायत्त कमजोर होगी. आदिवासी भूमि अधिकारों का हनन होगा. CPI के नेता ने महामहिम राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा है कि यह संशोधन विधेयक जनजातीय अधिकारों, संघीय ढांचे और राज्य की भूमि, जल व वन संपदा पर सीधा हमला है.
संशोधन विधेयक के समर्थन में केन्द्रीय सरकार का पक्ष:- केंद्रीय खनन मंत्री जी कृष्ण रेड्डी ने राज्यसभा में कहा कि यह कानून राज्य स्वायत्त या राज्यों के राजस्व के अधिकारों पर हस्ताक्षर नहीं करता है. इसका उद्देश्य देशभर में खनिज संपदा में एक दर सुनिश्चित करना है. केन्द्र का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में सेस के राशि में भिन्नता से खनन कंपनियों की लागत में बोढ़ोतरी होगी.
अतः संक्षिप्त में यह समझना जरूरी है कि रॉयल्टी सुरक्षित है,सेस लागने का अधिकार छीना है. और यह बहुत बड़ी रकम है. राज्य पर 15,216 करोड़ रुपए का वार्षिक संकट है. जो सीधे आदिवासी विकास को प्रभावित करेगा. यह सिर्फ कानून लड़ाई नहीं है, यह उन लाखों आदिवासी का सवाल है, जिनकी जमीन से खनिज खोदकर देश की अर्थव्यवस्था चलती है, लेकिन उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिल पाता है. सच में क्या आपको लगता है,यह आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं हो रहा है ?
संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक, आदिवासी परिचर्चा।

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