क्या नया है खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक - 2026 में, कैसे झारखंड के लिए आर्थिक संकट पैदा कर सकती है?


रांची: भारत के संसद ने लोकसभा में 13 अगस्त 2026 को नया खान एवं खनिज ( विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक -2026 पारित किया. जिससे संक्षिप्त में एमएमडीआर संशोधन विधेयक कहां गया. जो राज्य के अन्तर्गत आने वाले खान एवं खनिज विकास व विनियमन को नियंत्रित करेगा. इसके पहले खनन एवं उससे संबंधित सभी प्रकार के क्रियाकलाप खान एवं खनिज ( विकास एवं विनियमन) अधिनियम 1957 के अनुसार  खनन संचालित होता था.आज हम इसी कानून के बात करेंगे जो आदिवासी जनता के लिए सीधे खतरा बन सकता है. यही एमएमडीआर संशोधन विधेयक 2026 अखबार की सुर्खियां बटोरी रही है कि झारखंड सरकार खनिजों पर नहीं ले सकेगी सेस लेकिन कोई लोग इससे लगत पढ़ रहे हैं.और सुना रहे हैं.और यह सवाल पुछते सुनाई दे रहे है झारखंड सरकार की रॉयल्टी भी छीन जायेगी?  हम इस आलेख से तीन सवालों का जबाब खोजेने का प्रयास करेगें पहला वास्तविक कानुन स्थिति क्या है ? रॉयल्टी गई या सेस दुसरी उसके पीछे का काहनी क्या है? और इससे आदिवासियों पर क्या असर पड़ेगा. पहले समझने का प्रयास करेंगे कि रॉयल्टी और सेस क्या है ? जब कोई कंपनी जमीन के नीचे से कोयला, लोहा, या कोई खनिज निकालता है, तो कंपनी जमीन के मालिक को एक तय रकम देती है. इससे रॉयल्टी कहते हैं.भारत में खनिज संसाधन राज्य सरकार की संपत्ति है. इसलिए राज्य सरकार को कंपनी रॉयल्टी देती है या कह सकते हैं मिलती है, लेकिन यह दर केवल केन्द्र सरकार तय करती है. उदाहरण के रूप में झारखंड में कोयले पर 14% रॉयल्टी, लोहे पर 10-15% लगी है, तो यह राशि सीधे राज्य सरकार की खाते में जाती है. यह नये संशोधित कानून से प्रभावित नहीं है. जबकि सेस एक अलिखित कर है. जो राज्य सरकार रॉयल्टी के ऊपर लगाती है जैसे झारखंड ने 2024 में कहा था कि  हम कोयले पर 100 रुपया प्रति टन वसुलेंगे यह सेस था और नया कानून कह रहा है कि एम एम डी आर संशोधन बिल से राज्य सरकार से सेस लगाने की आधिकार रही है. नया कानून के अनुसार राज्य सरकार खनिजों अधिकारों के तहत या खनिज भूमि पर कोई भी टैक्स या सेस नहीं लगा सकता है. वहीं यानी केन्द्र सरकार टैक्स या सेस लगा सकती है. जो केन्द्र सरकार के शर्तों के अनुकूल हो, सीधे शब्दों में कहा जा सकता है रॉयल्टी सुरक्षित है, लेकिन नया संशोधन विधेयक या कानून से सेस को खत्म कर दी गई है. आज के प्रासंगिकता में यह विवाद अचानक नहीं आया यह दशकों पुराना है. 2004 से पहले केंद्र सरकार कहती थी टैक्स लगाना हमरा काम है. राज्य सरकार को सिर्फ रॉयल्टी मिलेगी. फिर इस साल यानी 2004 में Kesorsm Industries मामला में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों के पीठ ने कहा रॉयल्टी एक टैक्स है, इसलिए राज्य सरकार इसके ऊपर ओर टैक्स नहीं लगा सकते.इससे झारखंड जैसे खनिज सम्पन्न राज्य को भारी नुक़सान हुआ, फिर 25 जुलाई 2024 के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला Mineral area development authority V/s Steel authority of India में सुप्रीम कोर्ट नौ जजों संवैधानिक पीठ ने 8/1 बहुमत से फैसला सुनाया रॉयल्टी कोई टैक्स नहीं है. यह एक संवैधानिकता अधिकार है. यह झारखंड, उड़ीसा व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए एक बहुत बड़ी जीत थी. क कोर्ट यह भी कहा कि 1 अप्रैल 2005 से बकाया टैक्स राज्य सरकार वसूली कर सकता है. वह भी 12 सालों के किस्तों में भुगतान का आदेश दिया. उद्योग जगत के अनुमान के अनुसार यह राशि डेढ़ से 2 लाख करोड़ रुपए थी. सरकारी पीएसयू पर अकेले 70000 करोड़ का बोझ था. 

अगस्त 2024 में झारखंड सरकार की त्वरित कार्रवाई: - कोर्ट के फैसले के एक हाफ्ते के भीतर 2 अगस्त 2024 को झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing land cess Act 2024 पारित किया. इसमें कोयला और लौह पर 100 प्रति टन, बाक्साइट पर  70 प्रति टन, चुना पत्थर पर और मैगनिज पर 50 रूपया प्रति टन सेस लगाया गया. जो केन्द्र सरकार के लिए  अनुकूल नहीं  हैं.

केन्द्र सरकार का जबावी कदम : फिर  13 अगस्त 2026 केन्द्र सरकार का जबावी कदम के रूप संसद से एम एम डी आर संशोधन विधेयक 2026 पारित किया.जो इस अधिकार को पूर्ण  वापस ले लेता है. इससे जरुरी सवाल यह उठता है कि झारखंड राज्य के खनिज से आने वाले राजस्व का क्या होगा ? मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने महामहिम राष्ट्रपति को लिखे पत्र में  खनिज आने वाले राशि का आंकड़े दिए हैं, जो इस प्रकार है:- 

         1)  वर्ष -, 2024-25- 1,379 करोड़ रुपए 

          2)  वर्ष -, 2025-26- 7,488 करोड़ रुपए 

         3) वर्ष -  2026-27- 13, 215 करोड़ रुपए ( अनुमान) राशि आयेगा. यानी राज्य की राजस्व तेजी से बढ़ रही थी. और एक चौंकाने वाली आंकड़े यह भी है कि झारखंड का 84.9% गैर-कर राजस्व झारखंड के खनन क्षेत्रों से आता है. यह नया कानून उस बड़े हिस्से को प्रभावित करता है. 

इस संशोधन विधेयक से  राज्य की कौन-सा योजनाएं खातरे में : 

मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना:- इस संशोधन विधेयक से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले योजना में  मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना  है, इस योजना के अन्तर्गत राज्य के 50 लाख से अधिक महिलाएं लाभार्थी है, जिन्हें 2500 रुपए प्रति माह  प्रति महिला को मिलती है.यह झारखंड सरकार की सबसे बड़ी और लोकप्रिय योजना है.

आबुआ आवास योजना:- यह राज्य की दुसरी सबसे बड़ा और गरीबों परिवार को पक्का मकान दिए जाने वाले योजना है. यह  योजना भी संशोधित कर से प्रभावित होगा. यानी इसके लिए धन राशि में संकट आ सकते हैं. जिसका सीधा असर ग़रीबों पर पड़ेगा.

शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और पेंशन जैसे योजनाएं पर प्रभाव: सेंस से प्राप्त राशि से शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सुविधाएं जनता को उपलब्ध कराने में सरकार सक्षम होती थी। परन्तु नये कानून से सेस बंद होने पर इन मदों में खर्च करना सरकार के लिए टेड़ी खीर साबित हो सकती है. इसके अलावा ग्रामीण विकास कार्य, आदिवासी कल्याण कार्यक्रम के राशि इसी मद से खर्च किए जाते है. 

इस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्पष्ट कहा है कि अगर नया कानून लागू हुआ तो इन सभी योजनाओं पर ताला बंद कर देनी होगी. यह सिर्फ सरकारी आंकड़े और योजना का सवाल नहीं है. यह झारखंड के उन जल, जंगल व जमीन से जुड़े हुए मामले है, जो यहां के आदिवासी अपने जान से अधिक मानते हैं. 

झारखंड के आदिवासियों के वास्तविक स्थिति क्या है:- आप जानते होंगे कि राज्य के कुल आबादी में 26.9% यानी लगभग 27% लोग आदिवासी हैं. झारखंड देश का सबसे खनिज समृद्धि राज्य है. यहीं से देश का 40% कोयला, 25% लोहा, तथा 18% तांबा पाए जाते हैं. पर विडंबना देखिए यहां के जनजातीय आबादी देश के सबसे गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर है. खनन से विस्थापन का दर्द भी यहां सबसे अधिक है. पिछले दशकों में लाखों आदिवसी खनन से विस्थापित हुए हैं. सेस से मिलने वाली राशि इन्हें पुनर्वास, मुआवजा एवं सामाजिक विकास कार्यों में खर्च होती थी. 

तत्काल इसका क्या असर होगा:- सेस की नहीं आने पर तत्काल यह असर होगा कि 50 लाख महिलाओं को मिलने वाली राशि में संकट उत्पन्न होगी. शिक्षा एवं  स्वास्थ्य जैसे बुनियादी बजट में कटौती होगी और खनन क्षेत्र के विकास कार्य प्रभावित होगी या रुकेगी. पर्यावरण, पुनर्स्थापना योजना पर भी असर पड़ेगा. विस्थापित परिवारों का पुनर्वास भी धीमा होगा.

दीर्घ कालीन असर पड़ेगा:- राज्य के वित्तीय स्वायत्त कमजोर होगी. आदिवासी भूमि अधिकारों का हनन होगा. CPI  के नेता ने महामहिम राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा है कि यह संशोधन विधेयक जनजातीय अधिकारों, संघीय ढांचे और राज्य की भूमि, जल व वन संपदा पर सीधा हमला है. 

संशोधन विधेयक के समर्थन में केन्द्रीय सरकार का पक्ष:- केंद्रीय खनन मंत्री जी कृष्ण रेड्डी ने राज्यसभा में कहा कि यह कानून राज्य स्वायत्त या राज्यों के राजस्व के अधिकारों पर हस्ताक्षर नहीं करता है. इसका उद्देश्य देशभर में खनिज संपदा में एक दर सुनिश्चित करना है. केन्द्र का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में  सेस के राशि में भिन्नता से खनन कंपनियों की लागत में बोढ़ोतरी होगी.

अतः संक्षिप्त में यह समझना जरूरी है कि रॉयल्टी सुरक्षित है,सेस लागने का अधिकार छीना है. और यह बहुत बड़ी रकम है. राज्य पर 15,216 करोड़ रुपए का वार्षिक संकट है. जो सीधे आदिवासी विकास को प्रभावित करेगा. यह सिर्फ कानून लड़ाई नहीं है, यह उन लाखों आदिवासी का सवाल है, जिनकी जमीन से खनिज खोदकर देश की अर्थव्यवस्था चलती है, लेकिन उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिल पाता है. सच में क्या आपको लगता है,यह आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं हो रहा है ? 

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक, आदिवासी परिचर्चा।

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