संताली पाठ्य पुस्तकें ओल चिकि में प्रकाशित हो, मांग को लेकर मारांङ बुरु आखड़ा के सदस्य मिले पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से, मिला आश्वासन , केन्द्रीय शिक्षा मंत्री को पत्र प्रेषित

 


जामशेदपुर: निरंतर कई वर्षों से संताल समाज क विभिन्न संगठनों के द्वारा संताली भाषा की पाठ्य पुस्तकें, संदर्भ सामग्री एवं मार्गदर्शिका का प्रकाशन एवं प्राथमिक स्तर से उच्च शिक्षा तक की पढ़ाई ओल चिकि लिपि से करने की मांग की जा रही है.  पर, इसके बावजूद झारखंड सरकार की ओर से इस दिशा में कोई ठोस साकारात्मक पहल की उम्मीद नहीं की जा रही है.

विगत कुछ महीने पहले सूत्रों से जानकारी मिली थी कि एनसीईआरटी द्वारा संताली भाषा के लिए ओल चिकी लिपि से पाठ्यक्रम, निर्देशिकाएं एवं पाठ्यचर्या के अनुवाद कार्य करने की बात की जा रही थी.परन्तु अचानक से इस कार्य  गति में धीमि आने लगी अंततः कुछ दिनों के बाद अनुवाद कार्य पूर्ण रूप से बंद कर दिया गया. इस कार्य में लगे एक विशेषज्ञ ने मुझे बताया कि " संताली अनुवाद के लिए नियुक्त संयोजक को पहले  अपने पद से हटाया गया फिर अनुवाद के काम ओल चिकि लिपि से देवनागरी करने हेतु   शिक्षक प्रतिनियुक्ति किए गए जो अपने आप एनसीईआरटी के कार्य शैली पर  प्रश्न खड़ा करती है. किसके आदेश में यह कार्य बंद कर दिया अभी भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिली है, जो एक लिपि एक भाषा से मेल नहीं खाती है. 

इसके बावजूद संताल लोग छुप नहीं बैठे रहे, नियमित रूप से सामाजिक संगठनों एवं इससे जुड़े कार्यकर्ता के लोग ज्ञापन लेकर संसद, विधायक,मंत्री एवं सरकार के उच्च अधिकारियों से मिल रहे हैं. वाबजूद राज्य सरकार ने इस मामले में रुचि नहीं दिखाई, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस विषय में राज्य की वर्तमान हेमंत सोरेन की सरकार गंभीर नहीं है.इस पर पुर्नविचार कर नये तरीके से रणनीति बनाने की आश्यक है. लेकिन ज्ञापन सौंपा की सिलसिला जारी रखते हुए विगत दिन पारसी आरीचाली माराङ बुरु आखड़ा दुमका के सदस्यों ने झारखंड के पुर्व मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास से मिलें, उन्होंने इस मांग को जायज ठहराते हुए इससे पहल करने हेतु केन्द्रीय शिक्षा मंत्री श्री प्रल्हाद जोशी जी को लिखा पत्र कर उचित कदम उठाए जाने की आग्रह किया है. जो पत्र लिखा गया, जिसका मूल अंश इस प्रकार हैं:- प्रिय जोशी जी, सप्रेम नमस्कार, मैं आपका ध्यान " पारसी आरीचाली माराङ बुरु आखड़ा दुमका द्वारा झारखंड के विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों की ओर से समर्पित एक महत्वपूर्ण ज्ञापन ( मूल प्रति संलग्न) की ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं,

संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित संताली भाषा की अपनी स्वतंत्र वैज्ञानिक एवं सर्वमान्य लिपि"ओल चिकि " जिसका अविष्कार महान समाज सुधारक गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू जी ने किया था. यह लिपि संताली भाषा की ध्वन्यात्मक संरचना एवं शुद्ध उच्चारण को पुर्णत: अभिव्यक्ति करने में सक्षम है. विगत वर्षों भारत सरकार द्वारा ओल चिकी लिपि का शाताब्दी वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर गौरवपूर्ण मनाया गया. जिसमें महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा ओल चिकि संताली में भारत के संविधान का लोकार्पण तथा पंडित रघुनाथ मुर्मू जी के स्मृति में स्मारक सिक्का जारी किया गया.

वर्तमान में यह संज्ञान में आया कि एनसीईआरटी द्वारा संताली भाषा की पाठ्य पुस्तकें को देवनागरी लिपि में अनुवाद एवं प्रकशित करने की विचार किया जा रहा है. जिसमें संताली भाषी समाज में असंतोष एवं भ्रम की स्थिति है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा की मूल अस्मिता और संरक्षण पर बल देती है. ओल चिकी लिपि के स्थान पर किसी अन्य लिपि का प्रयोग संताली भाषा की मूल प्रकृति एवं करोड़ों संताली भाषा-भाषियों सांस्कृतिक भावनाओं के प्रतिकूल होगा. 

अतः अनुरोध है कि जनभावनाओं एवं भाषाई शुद्धता का सम्मान करते हुए एनसीईआरटी तथा शिक्षा मंत्रालय के अधीनस्थ सभी संबंधित संस्थानों को स्पष्ट निर्देश देने की कृपा करे,कि संताली भाषा की सभी पाठय पुस्तकें, संदर्भ सामग्री शिक्षक मार्गदर्शिकाएं एवं डिजिटल संसाधन आदि अनिवार्य रूप से केवल ओर केवल उसकी मूल एवं स्वीकृति ओल चिकि लिपि में ही तैयार एवं प्रकशित हो, आपने सकारात्मक एवं समयबद्ध निर्णय से देश के करोड़ों संताली भाषियों की समृद्ध सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान को सबल प्राप्त होगा.

अब प्रश्न उठता है कि क्या यही काम झारखंड की लाखों जनताओं के वोट से चुनीं हुई संताली मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार नहीं कर सकते थे.

संकलन: कालीदास मुर्मू,  संपादक आदिवासी परिचर्चा। 

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