संताली लोकजीवन में चित्रकला का महत्व व आवश्यकता

 


संताली लोकजीवन में चित्रकला का विशेष ‌‌‌महत्व है। चित्र के द्वारा , संतालों की संस्कृति, रीति-रिवाजों, आचार-विचार आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। संताली लोकजीवन में चित्रकला को लोक भाषा के रूप में मानते हैं। चित्र के द्वारा ही लोकजीवन के भाव को अभिव्यक्ति करते हैं । संताली लोक जीवन में कई प्रकार के  चित्रकला पाते जाते हैं। जो निम्नलिखित है:- 

(क) खोड़ चित्रकला 

(ख) दाग चित्रकला 

(ग) भित्ति चित्रकला 

(घ) गुदना चित्र कला 

(क) खोड़ चित्रकला:-  संताल लोकजीवन में "प्रकृति की पूजा" एंव "प्रकृति पर्व" का विशेष महत्व है। प्रकृति पर आस्था व विश्वास रखकर संताल लोग  प्रकृति की पुजा करते हैं। इनके लोग कथा के अनुसार " संताल के पूर्वज पिलचू हाड़ाम व पिलजू बुढ़डी ,जब जवान हुई तब माराङ बुरु ने इन्हें विवाह कर दिया, जब इनके वंशज बढ़ गये, तब "सिरजोनिया" के आदेश से माराङ सुरु ने " चमेञ गुरु " की सहायता से "गोत्र" एंंव उप-गोत्र के अनुसार देवी- देवताओं का नाम बताया,तथा उन देवी-देवताओं को आह्मान किया गया तथा पूजा के लिए माराङ सुरु ने खोड़ बनाया। उसी खोड़ को ही परंपरागत पूजा के समय "खोड़" बनाते हैं।

खोड़ बनाने की प्रक्रिया: - निशिचत दिन निश्चित स्थान पर गांव के पूजारी (नायके)  द्वारा खोड़ बनाया जाता है। "खोड़" बनाने का उद्देश्य है, निश्चित स्थान पर निश्चित देवता के लिए घर बनाना होता है। "खोड़" चावल चूर्ण द्वारा बनाया जाता है। खोड़ बनाने के समय हाथ घड़ी काटा के विपरीत दिशा में घुमाया जाता है। खोड़ में पूजाकर मुर्गा एंव मुर्गियों की बलि दी जाती है।  

(ख) दाग चित्रकला:- संताली लोकजीवन में अपनी सामाजिक कार्य सम्पदान के लिए, गोत्र के अनुसार कार्यों को कई भागों में विभाजित किया है। उसी को परम्परागत गोत्र के साथ " पदवी" के रूप में जोड़ते हैं।जो निम्नलिखित है:- हांसदा गोत्र लोगों  के लिए  "बढ़ई" का कार्य करते हैं। इसलिए हांसदा गोत्र को "बाडोही" कहा जाता है। मार्डी गोत्र के लिए "कृषि कार्य" इसलिए इससे "मार्डी किसाड़" कहा जाता है । किस्कु गोत्र के लोग राज-काज में निपुण थे। अतः इन्हें "किस्कु रापाज" कहा जाता है। इस प्रकार मुर्मू गोत्र के लोग सामाजिक कार्य एवं पुरोहित कार्य में होने के बाजह से इसे "मुर्मू ठाकुर" का पदवी दिया गया है। संताली लोकजीवन में गोत्र पदवी के अनुसार दाग या प्रतिक चिन्ह प्रयोग में लाते हैं। अर्थात् आज भी परंपरागत अनुसार  आज भी गाय या बैल पर दिया जाता है। जिससे " जाति दाग" या " गोत्र दाग" कहा जाता है। 

(ग) भित्ति चित्रकला:- संताली लोकजीवन में भित्तिचित्र कला का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह चित्रलेखा विभिन्न सामाजिक अनुष्ठानों में सबसे अधिक लोकप्रिय है। संताली में भित्तिचित्र को " भित पोहाव" कहते हैं। गांव में जब नये घर की नींव रखी जाती है, उस समय गांव के लोग एक नक्शा बनाते हैं। घर की उत्तर दिशा को "जोनोम" अर्थात् जन्म का, दक्षिण का दिशा को "मोरोन" अर्थात् मृत्यु का, पूर्वी भाग को "सिञचांदो" अर्थात् सूरज का, तथा पश्चिम  दिशा को "ञिदाचांदो " अर्थात् चन्द्रमा का प्रतिक माना गया है। घर दो भागों में विभक्त होता है। एक "बोंगा ओड़ाक" पूजा घर तथा दुसरा भाग " गितिज ओड़ाक" यानी सोने का घर । गोत्र के अनुसार घर " चातोम ओड़ाक" "कोठा ओड़ाक"  "बांग्ला ओड़ाक" या " खोष ओड़ाक"। स्त्रियों द्वारा दीवालों पर पत्ते,फुल,फल, सूर्य, चन्द्रमा, पेड़ , पौधे एंव पिरामिड आदि का चित्र बनाते हैं।  दैनिक जीवन में प्रयोग में लाते जाने वाली वस्तुओं का भी चित्रण भी बनाते हैं। जो उनकी लोककथा या लोकगीतों के आधार पर होता है। भित्तिचित्र कला संताल संस्कृति का प्रतीक है।

(घ) गुदना चित्रकला:- संताली लोकजीवन में " गुदना" या " खोदा" जीवन का अभिन्न हिस्सा है। लड़कियों जब युवावस्था में पदार्पण करती है । तब " ओझाइन" या " खोदनी" द्वारा अपने शरीर पर अनेक प्रकार के चित्र अंकित कराते हैं। उसे " गुदना" कहते हैं। "गुदना" लड़कियों के शरीर पर श्रृंगार तथा धर्म आस्था के लिए किया जाता है। गुदने के प्रति संताल समूह में अनेक किवदंतियां है। यह भी विश्वास है कि शरीर पर गुदना या सिखा रहने से लड़की या लड़का का "गोत्र तथा उपगोत्र " की पहचान होती है। इस चित्रकला को समझने का समय आ गया है। 

संताल समाज में गुदने के की प्रकार होते हैं। विशेषकर महिलाओं गला, छाती,हाथ, तथा पैरों पर अलग-अलग खुदाया करती है। गला एंव छाती में पर आभूषणों का चित्र अंकित किया जाता है। आभूषण चित्र से सौन्दर्य की अभिव्यक्ति होती है।

उपायुक्त चित्रलेखा या चित्रकला से यह स्ष्पट होता है ,कि संताली लोकजीवन में चित्रकला का महत्त्वपूर्ण स्थान है। 






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