आदिवासी समाज में स्वशासन का उद्भव एवं विकास की अवधारणा

 


झारखण्ड में स्वाशासन की  समृद्ध परंपरा हजारों  वर्ष पुरानी है. परन्तु वर्तमान  शासन व्यवस्था में स्वाशसान जिससे मुण्डारी शब्दों में " आबुआ दिशुम आबुआ राज" कहा गया है, मुलत: आज तक के आदिवासी प्रतिरोध के स्वर में यही आवाज़ गूंजती रही,वह चाहे किसी भी कालखण्ड के हो, की मुल भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. उसके कई कारण और मायने हो सकते. इस आलेख में हम इस बात को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे कि आदिवासी समुदायों के लोगों में  स्वशासन व्यवस्था की परिकल्पना का उभ्दव एवं संरचना किस तरह से हुई.  इतिहास बताते हैं,कि झारखण्ड क्षेत्र के घनघोर जंगलों से इलाकों में आदिवासी समुदायों के लोगों का पहला कदम रखने और अंततः बस जाने के समय से अनुमानतः लगभग पांच वर्षों तक यहां की भौगोलिक सीमा रेखा की चहारदीवारी ने उन्हें बाहृय जगत के लोगों के उत्पीड़क आक्रमण से सुरक्षा प्रदान की. इस लंबी स्थिरता और शांति ने उन्हें अपने सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए नीति-निर्धारण और आचार- संहिता के सृजन और निर्माण का अवसर प्रदान किया. 

आमतौर पर प्रत्येक आदिवासी पूर्वजों ने अपने तथा अपनी संतानों के  आजीविका के लिए जंगल साफ कर खेत-खलिहान और गांव बसाया. की मायने में इस प्रकार से सृजित किए गए गांव ही उनका सर्वस्व था. यही उनका राज्य - क्षेत्र ठहरा जिसके सीमा-क्षेत्र के अन्तर्गत पड़ने वाली सभी आन्तरिक एवं बाहय  संपत्तियों पर सामूहिक मालिकाना अधिकार है. इस दृष्टिकोण से गांव ही ही उनकी दुनिया थी, जहां उन्हें पुश्त-दर- पुश्त जन्म से मरण तक जीता है. सिर्फ सामाजिक अनुष्ठान और व्यापार के प्रयोजनों के लिए दूसरों गांव ‍ से सरोकार - संबंध रखना पड़ता था. 

इस प्रकार उनका  अपना  गांव  ही सामाजिक, धार्मिक , प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों तथा व्यवस्थाओं का केन्द्र- बिन्दु था. गांव के सभी वयस्क तथा वृद्ध व्यक्ति एक साथ इकट्ठा होकर गांव से संबंधित उपर्युक्त विषयों पर विचार विमर्श करते थे. आम सहमति से निर्णय लेते और नियमानुसार आचरण करते थे. यहीं से ग्राम सभाओं  की उत्पत्ति या शुरुआत हुई. बैठक का स्थल को आखड़ा के रूप में चिन्हित किया गया. कालांतर में यह सामाजिक एवं  प्रशासन,  मनोरंजन केंद्र बना.

इस संदर्भ में इतिहासकार शरत चन्द्र राय लिखते हैं, " प्रत्येक गांव के आंतरिक प्रशासन में बुजुर्गों की परिषद् ( ग्राम सभा- कौंसिल आफ एल्डरमैन) गांव के मुखिया ( विलेज हेडमैन) की सहायता करती है.

कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा

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