विगत दिनों झारखंड के राजधानी रांची में आयोजित जनजातीय संवाद में आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान दिया है, जो रांची के दैनिक प्रकाशित अखबारों में छपा है. उन्होंने अपने बयान में कहा है कि " आदिवासी और हिन्दू समाज हम अलग-अलग नहीं है" उनका यह बयान विवादास्पद हैं. चाहे वह इतिहास हो, सांस्कृतिक हो, या मानवतथ्य विषय हो, जो स्पष्टतः कहता है कि आदिवासी और हिन्दू समाज अलग है. आदिवासी की भूमि पर भारत देश वसा है, तो हिन्दू आर्यों संस्कृति है, जो बहार से आया है, यह विषय भावानात्मक नहीं है, वल्कि तथ्यों पर आधारित है, इतिहास, संविधान, समाजशास्त्र और आदिवासियों के आधार पर इस विषय को समझने का प्रयास करेंगे.
आधुनिक जेनेरिक अध्ययन बता रहा है कि आर्यों लोगों के भारत आने से पहले हज़ारों वर्ष पहले आदिवासी भारत में रहते आ रहे हैं. आफ्रीका से 65-70 हजार वर्ष पहले आए हुए होमोसेपियंस के वंशज पहले भारत की भूमि पर बसे हुए थे. जो आज भी भारत की इस पवित्र भूमि पर बसे हुए हैं. प्राकृतिक जीवन जीने की पद्धति जो सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों में उतारने वाले मानव समूह को हो आज के समय में आदिवासी कहा जाता है. होमोसेपियंस के सीधे वंशज में अण्डमान और निकोबार के निग्रोटो, जरवा, सेटिनेली, ओंगे, शाम्पेन आदिवासी माने जाते हैं. जबकि भील, गोड़, मुण्डा, संताल, हो, उरांव आदि बाद के आदिवासी समूह माने जाते हैं.
दक्षिण भारत में सौलिंगा लोगों को भी प्राचीन निवासी माना जाता है, राजस्थान के कालबेलिया आदिवासी को भी प्राचीन समुदाय के रुप में जाना जाता है. आर्यों अधिकतम 1500 ईसा पूर्व भारत में आए थे. मौजूदा आदिवासी 48-45 ईसा से रहते आ रहे हैं. आस्ट्रो-एशियाटिक मुण्डा परिवार दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत आए, तो वहीं आर्यों यानी हिन्दू लोग मध्य एशिया से सिन्धु घाटी क्षेत्र होते हुए भारत में आए. कहां हम पूर्व से आए और हिंदू पश्चिम आए, यहां तो पूर्व और पश्चिम को मिलने की बात हो रही है. क्या यह संभव है ? पूर्व और पश्चिम का मिलना या सुर्य उदय और सूर्य अस्त का मिलना? यदि ऐसा हुआ तो समझिए दिन और रात का चक्र थम जायेगा. तो क्या मोहन भागवत दिन और रात के चक्र को रोकना चाहते हैं?
हिन्दू शब्द की उत्पत्ति ऐतिहासिक रुप से संस्कृत के सिंधु शब्द से मानी जाती है. जो सिंधु नदी के क्षेत्र का उल्लेख करता है, फारसी (ईरानी) आक्रमणकारियों ने " स" का उच्चारण "ह" के रूप में किया. जिसमें सिंधु बदलकर हिन्दू हो गया.यह एक भौगोलिक पहचान थी, न कि प्रारंभिक रुप से धार्मिक. यह शब्द मूलतः भारत के निवासियों या सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया था. जबकि आदिवासी तो भारत भूमि के मूल निवासी हैं. न कि वैसे समूह जो अपना पहचान बदल बदल कर रह रहे हैं. आदिवासी पहले भी आदिवासी थे, आज भी आदिवासी हैं और भविष्य में आदिवासी रहेगें.
आजकल हिन्दू एवं ईसाईयों के द्वारा आदिवासियों का संस्कृतिकरण हो रही है. आदिवासी व प्रकृति के देवी-देवताओं को हिन्दू देवी देवताओं के रूप में बताना, जाहेरथान पर जीशू जाहेर स्थापित करना, जाय गोसाई माराङ बुरु के समानांतर जीशू माराङ जैसे शब्दों से लोगों को दिकभ्रमित करना. पूजा में बहरी पुरोहित लाना, संतालों का महाकुंभ आयोजित करना. आदिवासी के पर्व त्योहार को हिन्दू के पर्व त्योहार में समाहित करना. इस प्रकार के प्रयासों को आदिवासी का संस्कृतिकरण नहीं तो ओर क्या है?
इनके द्वारा किए जा रहे संस्कृतिकरण को तब आप याद कीजिए जब यह लोग बोले कि आपका देवता तो शिव है. यह लोग तर्क देने लगे, आपका पर्व त्योहार तो हमारे पर्व का हिस्सा है. आदिवासी और हिन्दू अलग-अलग नहीं है. सरना- सनातन एक है. यह सब संपूर्ण आदिवासी कौम को हिन्दू या ईसाई में समाहित करने की कुंठित सोच है. आपको क्या लगता है आदिवासियों के साथ ऐसा नहीं हो रहा है? समझते रहिए. अब सवाल उठता है कि आदिवासियों का समाज, संस्कृति, धर्म, आध्यात्म, प्रकृति, पर्व, पूजा आदि यह किसी ओर का रुप बन जाय तो आदिवासीयत कहां बचेगी?
संकलन: कालीदास मुर्मू संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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