सवाल लोकतंत्र के आधार को मजबूती प्रदान करती हैं

 


लोकतंत्र केवल एक शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि विचारों, संवाद और सहभागिता की जीवंत प्रक्रिया है. इसका वास्तविक अर्थ है – जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन. किंतु यह आदर्श तब ही सार्थक होता है जब नागरिक जागरूक हों, प्रश्न पूछें और सत्ता से जवाबदेही की अपेक्षा करें. वास्तव में, सवाल ही लोकतंत्र के आधार को मजबूती प्रदान करते हैं. बिना प्रश्नों के लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है.

लोकतंत्र में सत्ता जनता से प्राप्त होती है. जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है ताकि वे उनके हितों की रक्षा करें और विकास सुनिश्चित करें. लेकिन यदि नागरिक अपने प्रतिनिधियों से प्रश्न न पूछें, उनकी नीतियों की समीक्षा न करें और निर्णयों पर विचार-विमर्श न करें, तो शासन तानाशाही प्रवृत्ति की ओर बढ़ सकता है.  प्रश्न पूछना नागरिक का अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है. यह अधिकार हमें भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से मिलता है.

भारतीय लोकतंत्र की सफलता का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां संसद, न्यायपालिका और मीडिया जैसे संस्थान प्रश्न उठाने और उत्तर मांगने की परंपरा को जीवित रखते हैं. संसद में विपक्ष की भूमिका ही सरकार से सवाल पूछने की होती है. प्रश्नकाल के माध्यम से सरकार से नीतियों और कार्यों पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है. इसी प्रकार मीडिया भी जनसरोकार के मुद्दों को उठाकर शासन से जवाबदेही सुनिश्चित करता है. जब समाज के विभिन्न वर्ग—छात्र, किसान, महिलाएं, मजदूर—अपने अधिकारों के लिए प्रश्न करते हैं, तब लोकतंत्र और अधिक सशक्त होता है.

इतिहास साक्षी है कि बड़े सामाजिक परिवर्तन प्रश्नों से ही शुरू हुए हैं. जब लोगों ने अन्याय, असमानता और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई, तब परिवर्तन संभव हुआ.  स्वतंत्रता आंदोलन भी प्रश्नों की एक श्रृंखला था—ब्रिटिश शासन की नीतियों पर सवाल, कर प्रणाली पर सवाल और स्वतंत्रता के अधिकार पर सवाल। प्रश्नों ने ही समाज को जागरूक किया और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया.

हालांकि, प्रश्न पूछने की संस्कृति को कई बार विरोध या असहमति के रूप में देखा जाता है.  लेकिन लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं, बल्कि विचारों की विविधता का प्रतीक है. स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां विभिन्न मतों को सम्मान दिया जाता है और तर्कपूर्ण बहस को प्रोत्साहित किया जाता है.  यदि प्रश्नों को दबा दिया जाए, तो समाज में भय और असंतोष पनपने लगता है. इससे लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ जाती हैं.

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अपनी बात रखने का मंच दिया है. अब लोग सीधे सरकार और प्रशासन से सवाल कर सकते हैं. लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है. प्रश्न तथ्यों पर आधारित और रचनात्मक होने चाहिए, न कि अफवाह या दुष्प्रचार पर. जब प्रश्न सकारात्मक दृष्टिकोण से पूछे जाते हैं, तो वे समाधान की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं.

शिक्षा भी प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति को विकसित करती है. एक विद्यार्थी जब कक्षा में प्रश्न करता है, तो वह ज्ञान के विस्तार का मार्ग खोलता है. इसी प्रकार समाज में प्रश्न विचारों के विकास और नीति-निर्माण को बेहतर बनाते हैं. इसलिए लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों में आलोचनात्मक सोच विकसित हो.

स्पष्ट  यह कहा जा सकता है कि सवाल लोकतंत्र की आत्मा हैं. वे शासन को पारदर्शी बनाते हैं, जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं और जनता को सशक्त बनाते हैं.  प्रश्नों के माध्यम से ही नागरिक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं और लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखते हैं. इसलिए हर नागरिक को निर्भीक होकर, तथ्यों के आधार पर और राष्ट्रहित में प्रश्न करने की संस्कृति को अपनाना चाहिए. यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है और यही उसकी स्थायी मजबूती का आधार भी.

संकलन: कालीदास मुर्मू,  संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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