आदिवासी संस्कृति जंगलों, पहाड़ों,नदियों और सामूहिक स्वामित्व की संस्कृति रही है. हमारी लड़कियाँ इस परंपरा की रक्षक होती थी। आज आधुनिकता के नाम पर शिक्षा और नौकरी का बहाना लेकर जब वे शहरों में जाती हैं,तो दिकू युवकों के जाल में फंस जाती हैं। ये दिकू उनके सौंदर्य,युवापन और सरलता का शोषण करते हैं. शादी का वादा करके या प्रेम का नाटक रचकर वे पहले शरीर का भोग करते हैं, फिर उस धन पर एय्याशी करते हैं. कई मामलों में लड़की गर्भवती होकर लौटती है या फिर छोड़ दी जाती है। इससे समाज में बदनामी,परिवार का टूटना और बच्चे की जड़हीन पहचान हो जाती है.
सबसे खतरनाक पहलू है भूमि का हस्तांतरण. आदिवासी क्षेत्रों में जमीन सामुदायिक होती है. जब लड़की दिकू से शादी करती है, तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसकी जमीन, मकान या संपत्ति पर दिकू का कब्जा हो जाता है. हजारों ऐसे मामले हैं जहाँ दिकू ससुराल की जमीन पर कब्जा करके होटल, दुकान या खेती शुरु कर देते हैं। धीरे-धीरे पूरा गांव बाहरी ताकतों के अधीन हो जाता है. यह सांस्कृतिक नरसंहार है. आदिवासी पहचान का विलय। हमारे पूर्वजों ने सदियों तक अंग्रेजों और जमींदारों से लड़कर जमीन बचाई,आज अपनी ही बेटियाँ उसे बेच रही हैं.
माता-पिता के लिए यह घोर अपमान है. वे जो अपनी बेटी को संस्कार सिखाकर बड़े करते हैं,उसी बेटी का दिकू के घर जाना उनके सिर पर शर्म का बोझ लाद देता है। समाज में वे सिर झुकाकर चलने को मजबूर हो जाते हैं.रिश्तेदार ताने मारते हैं,गांव वाले अलग-थलग कर देते हैं. क्या यह "व्यक्तिगत स्वतंत्रता" का नाम है? स्वतंत्रता का मतलब आत्मघाती नही होता है .जब एक समुदाय की महिलाएँ बाहर जाती हैं तो उसकी जनसंख्या,संस्कृति और आर्थिक आधार कमजोर पड़ता है.
दिकू पुरुष अक्सर आदिवासी लड़कियों को "एक्सोटिक" या "सरल" मानकर शोषण करते हैं. वे शादी का वादा तो करते हैं पर बाद में "सांस्कृतिक अंतर" का बहाना बनाकर छोड़ देते हैं. बच्चे न तो पूरी तरह आदिवासी होते हैं न दिकू. वे दोहरी पहचान के शिकार बनते हैं. वहीं दिकू लड़कियाँ अपने समाज में शादी करती हैं तो उसकी संपत्ति उनके समाज में ही रहती है. आज समझने की जरुरत है कि आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों?
आदिवासी संगठनों,युवा नेताओं और बुजुर्गों को अब सख्त कदम उठाने चाहिए.अंतर-जातीय विवाह पर सामाजिक बहिष्कार,जमीन संबंधी कानूनों में सख्ती और लड़कियों को अपनी संस्कृति की शिक्षा देना जरुरी है. शिक्षा और नौकरी जरुरी है,पर जड़ों से कटकर नही. प्रेम का नाम लेकर जो सांस्कृतिक आत्मसमर्पण हो रहा है, वह घोर पतन है.
आदिवासी बेटियाँ! तुम्हारा शरीर,तुम्हारा सम्मान और तुम्हारी जमीन सिर्फ तुम्हारी नही, पूरे वंश और समुदाय की है. इसे दिकू के चंगुल में मत फंसाओ. अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ तुम्हें इतिहास की गद्दार कहेगी.आदिवासी समाज को जागना होगा, वरना हमारी पहचान सिर्फ किताबों और संग्रहालयों में सिमट जाएगी.
संकलन: श्री लक्ष्मीनारायण मुंडा, रांची।

0 Comments