हिजला मेला: इतिहास, परंपरा और स्वशासन की जीवंत धरोहर

 


झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में यदि किसी मेले ने लोकजीवन, परंपरा और सामुदायिक स्वशासन को एक सूत्र में पिरोया है, तो वह है हिजला मेला। संताल परगना के दुमका क्षेत्र में आयोजित यह मेला केवल व्यापार या मनोरंजन का केंद्र नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की ऐतिहासिक चेतना और स्वायत्त शासन परंपरा का प्रतीक रहा है।

हिजला मेला का इतिहास औपनिवेशिक काल से जुड़ा माना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में जब ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी असंतोष बढ़ रहा था, तब संताल समुदाय ने अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक एकजुटता को सुदृढ़ करने के लिए सामूहिक आयोजनों को माध्यम बनाया। 1855-56 के संताल हूल के बाद इस क्षेत्र में सामाजिक पुनर्गठन और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने की आवश्यकता और अधिक महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में हिजला मेला ने एक संगठित स्वरूप ग्रहण किया।

दुमका स्थित हिजला पहाड़ी और मयूराक्षी नदी के तट पर आयोजित होने वाला यह मेला धीरे-धीरे संताल परगना की सांस्कृतिक राजधानी का रूप लेने लगा। यहाँ विभिन्न आदिवासी समुदाय—संताल, पहाड़िया, मुंडा आदि—अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र, नृत्य-गीत, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों के साथ भाग लेते रहे हैं। इस प्रकार हिजला मेला सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।

इतिहास के पन्नों में यह भी उल्लेख मिलता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय यह मेला जनजागरण का मंच बना। स्थानीय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यहाँ लोगों को संगठित कर सामाजिक सुधार और अधिकारों के प्रति जागरूक किया। बाद में झारखंड राज्य आंदोलन के दौरान भी यह मेला क्षेत्रीय अस्मिता और स्वायत्तता की मांग को अभिव्यक्त करने का स्थल रहा।

हिजला मेला की विशेषता इसकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था है। आदिवासी समाज में ‘मांझी-परगना’ प्रणाली लंबे समय से सामाजिक प्रशासन का आधार रही है। गाँव स्तर पर मांझी (प्रधान) और परगना (क्षेत्रीय प्रमुख) मिलकर सामाजिक न्याय, विवाद निपटारा और सामुदायिक निर्णय लेते रहे हैं। मेले के आयोजन में भी इसी परंपरा की भूमिका रही है। सामुदायिक सहयोग, सामूहिक श्रमदान और स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से इसकी व्यवस्थाएँ संचालित होती रही हैं।

वर्तमान समय में जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ औपचारिक ढांचे में कार्य कर रही हैं, तब हिजला मेला की स्वशासन परंपरा और भी प्रासंगिक हो जाती है। झारखंड में पेसा कानून के लागू होने से अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को व्यापक अधिकार मिले हैं। पेसा कानून की मूल भावना यही है कि आदिवासी समाज अपने परंपरागत रीति-रिवाज और संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखे। हिजला मेला इसी सिद्धांत का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ समुदाय स्वयं आयोजन, सुरक्षा, व्यापारिक अनुशासन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन करता है।

आज के समय में जब वैश्वीकरण और बाजारीकरण की प्रक्रिया तेज है, पारंपरिक मेलों का स्वरूप भी बदल रहा है। हिजला मेला में अब सरकारी विभागों की प्रदर्शनी, आधुनिक मंच और प्रशासनिक सहयोग भी शामिल हो गया है। फिर भी इसकी मूल आत्मा सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय नेतृत्व पर आधारित है। यह मेला दिखाता है कि आधुनिक प्रशासन और पारंपरिक स्वशासन एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।


स्वशासन की दृष्टि से हिजला मेला तीन प्रमुख संदेश देता है। पहला, स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में केंद्र में रखना चाहिए। दूसरा, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए विकास की राह अपनाई जा सकती है। तीसरा, ग्रामसभा और पारंपरिक नेतृत्व व्यवस्था सामाजिक समरसता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

आज जब आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, जल और जंगल के अधिकारों पर चर्चा हो रही है, तब हिजला मेला सांस्कृतिक चेतना के साथ-साथ राजनीतिक जागरूकता का भी मंच बन सकता है। यह न केवल अतीत की विरासत है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए सामुदायिक स्वायत्तता का मॉडल भी है।

अतः हिजला मेला केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की सामुदायिक आत्मा का उत्सव है। इसका इतिहास संघर्ष, एकता और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ा है, जबकि वर्तमान में इसकी स्वशासन व्यवस्था लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दिशा में प्रेरणास्रोत बनी हुई है। यदि इस परंपरा को संवैधानिक प्रावधानों और स्थानीय सहभागिता के साथ सुदृढ़ किया जाए, तो यह आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम सिद्ध हो सकता है। 

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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