आजादी के बाद भारत में संविधान लागू हुआ, जिसके अंदर आदिवासियों के लिए एक लघु संविधान ‘पांचवीं और छठवीं अनुसूची’ के रूप में शामिल किया गया. संविधान निर्माताओं ने आदिवासियों को भेदभाव मुक्त अधिकार प्रदान किया एवं उन्हें ‘स्थान और अवसर’ की समानता का अधिकार भी दिया. इसके अलावा उनके उपर होने वाले अत्याचार को रोकने हेतु अनुच्छेद 46 एवं उनके अस्तित्व के संरक्षण हेतु अनुच्छेद 19(5) एवं (6) में इसकी व्यवस्था की. लेकिन क्या आदिवासी सुरक्षित हो पायें हैं?
आज भारत के सर्वोंच्च (राष्ट्रपति) पद पर द्रौपदी मुर्मू के रूप में एक आदिवासी महिला विराजमान हैं, जो देश के 12 करोड़ आदिवासियों के संवैधानिक अभिभावक भी हैं. इसी तरह गिरिश चन्द्र मुर्मू देश के प्रथम आदिवासी सीएजी हैं और देश के तीन प्रमुख खनिज सम्पदा एवं आदिवासी बहुल राज्यों - झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं ओड़िसा के मुख्यमंत्री भी आदिवासी हैं. इसके अलावा केन्द्रीय मंत्री, सांसद, राज्य सरकारों में मंत्री, विधायक के अलावा काफी संख्या में आदिवासी बड़े सरकारी पदों पर विराजमान हैं. यह निश्चितरूप रूप से आदिवासियों के लिए विगत सात दशक की बड़ी उपलब्धि है. लेकिन क्या इन व्यक्तिगत उपलब्धियों से आदिवासी समाज को कुछ हासिल हुई है?
आदिवासी समाज का मूल आधार ‘‘सह-अस्तित्व, सामुदायिकता एवं समानता’’ है, जिसमें व्यक्तिगत उपब्लधियों के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि बड़े पदों पर बैठे हुए आदिवासी अपने समाज के लिए कोई ठोस योगदान नहीं दे पाते हैं, बल्कि वे ‘सामुदायिकता’ को छोड़कर ‘व्यक्तिवादी’ जीवन-चरित्र को अपना लेते हैं. इसका मूल कारण उनका समर्पण आदिवासी पहचान, आदिवासियत एवं आदिवासी समाज के बजाय बाहरी विचाधारा, राजनीतिक पार्टियां एवं धर्मों के प्रति होना है. जब द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति बनी थी तब आदिवासियों का संवैधानिक प्रमुख होने की वजह से आदिवासियों को उनसे बहुत उम्मीदें थीं.ऐसा लगता था कि अब आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का अनुपालन, सुरक्षा एवं संरक्षण होगा.
लेकिन उनके विगत दो वर्षों के कार्यकाल में आदिवासियों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगा है. देशभर के करोड़ों आदिवासी प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘‘विश्व आदिवासी दिवस” बड़े धूमधाम से मनाते हैं. लेकिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्म ने ‘‘विश्व आदिवासी दिवस” के मौके पर देश के आदिवासियों को कभी बधाई तक देना उचित नहीं समझा. जबकि 9 अगस्त 2011 को भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने ‘‘विश्व आदिवासी दिवस” के मौके पर ‘बधाई संदेश’ जारी करते हुए अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन किया था. इसी तरह मणिपुर कांड, मध्यप्रदेश पेशाब कांड एवं हसदेव जंगल के सवाल पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्म ने अपन मुंह नहीं खोला.अब आदिवासी लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसे आदिवासी राष्ट्रपति का क्या काम, जो अपने आदिवासी समाज के लिए खड़ी नहीं हो सकती हैं?
जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर आदिवासी लंबे समय से संघर्षरत हैं क्योंकि ‘‘विकास”, ‘‘प्रगति”, ‘‘जनहित”, ‘‘राष्ट्रहित” एवं ‘‘आर्थिक तरक्की” के नाम पर कानूनी एवं गैर-कानूनी तरीके से इन्हें कब्जा किया गया और यह सिलसिला अब भी जारी है. भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्यों के राज्यपालों को इनके संरक्षण हेतु विशेषाधिकार दिया गया है. इसके अलावा अनुच्छेद 19(5) एवं (6) का उपयोग करते हुए आदिवासी इलाको के संरक्षण हेतु ‘‘उचित प्रतिबंध" लगाने की व्यवस्था भी है. लेकिन राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने अनुसूचित क्षेत्र में पड़ने वाले 10 राज्यों के राज्यपालों एवं मुख्यमंत्रियों से आजतक कभी कोई बैठक, संवाद या पत्रचार भी नहीं किया. महाराष्ट्र के राज्यपाल को छोड़कर अनुसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाले 9 राज्यों के किसी भी राज्यपाल ने आदिवासियों की जमीन और उनके अधिकारों के संरक्षण हेतु अबतक कोई ठोस कदम नहीं उठाया. फिर आदिवासी कैसे बचेंगे?
अनुसूचित क्षेत्र ऐतिहासिकरूप से आदिवासियों का है, जिसके बारे में भारत सरकार अधिनियम 1919 एवं 1935 में उल्लेख किया गया है. विगत सात दशकों के अंदर राष्ट्रपति, राज्यपाल और केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने संविधान के अनुच्छेद 19 अनुच्छेद 19(5) एवं (6) का उपयोग करते हुए बाहरी जनसंख्या को अनुसूचित क्षेत्र में प्रवेश करने, बसने, व्यवसाय, पेशा एवं व्यापार पर ‘‘उचित प्रतिबंध” नहीं लगाया. फलस्वरूप, आज वहां बाहरी गैर-आदिवासियों का बहुमत हो गया है और आदिवासी अल्पसंख्यक हो चुके हैं. यहां जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करते हुए लोकसभा, विधानसभा एवं स्थानीय निकायों के पदों को सामान्य श्रेणी में कर दिया गया है. यह आदिवासियों के साथ सरासर अन्याय है. बाहरी लोग आदिवासियों की जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने के अलावा उनकी राजनीतिक अधिकारों को भी छीन रहे हैं.
सरकार ने आदिवासियों के हक और अधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रगतिशील काननू जैसे भूमि सुरक्षा कानून, अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून 1989, पेसा कानून 1996, वन अधिकार 2006, एवं विस्थापन एवं पुनर्वास कानून 2013 बनाया लेकिन आज भी आदिवासी लोग हाशिये पर इसलिए हैं क्योंकि आदिवासियों के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधान और कानूनों को लागू करने वाले लोग ही आदिवासियों के हक में बना संविधान, कानून और नीतियों का सम्मान, अनुपालन और इनके संरक्षण के बजाय इनकी अवहेलना कर रहे हैं. पेसा कानून 1996 को झारखंड सहित कई राज्यों में अबतक लागू ही नहीं किया गया क्योंकि खनन माफिया इसके खिलाफ है.
संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत केन्द्रीय सहायता प्राप्त करना आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार है, जिसे सुनिश्चित करने हेतु पांचवीं पंचवर्षीय योजना में ‘‘ट्राईबल सब-प्लान” की शुरूआत की गई. सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश के अनुसार “ट्राईबल सब-प्लान” का पैसा का उपयोग दो तरह से किया जाना है - आदिवासी को व्यक्तिगत लाभ पहुंचाना एवं आदिवासी बहुल इलाके का विकास हेतु खर्च. लेकिन ट्राईबल सब-प्लान के तहत आवंटन में कमी, राशि का दूसरे मदों में खर्च एवं फंड को खर्च न करना, आदिवासी का हक को जानबूझकर लूटने जैसा है. फिर आदिवासियों का विकास कैसे होगा?
आज आदिवासी गरीबी, भूखमरी एवं कुपोषण से जुझ रहे हैं. उनके लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की उचित व्यवस्था नहीं हो पायी है. रोजगार के अभाव एवं जलवायु संकट की वजह से खेती एवं वनोपज के उत्पादन पर विपरीत असर पड़ने से आदिवासी लोग बड़े पैमाने पर पलायन एवं मानव तस्करी के शिकार होने पर मजबूर हैं. आदिवासी महिलाएं एवं बच्चे बड़े पैमाने पर कुपोषण एवं खून की कमी से जुझ रहे हैं. आदिवासियों के लिए बनाये गये कल्याणकारी योजनाएं उन तक ठीक ढंग से नहीं पहुंच पा रही है. ऐसी स्थिति में वे अपने उज्जवल भविष्य के बारे में कैसे सोच सकते हैं?
आदिवासियों की भूमि सुरक्षा हेतु राज्यों में अलग-अलग कानून है, जिसका एक ही मकसद है, आदिवासियों की जमीन को गैर-आदिवासियों के यहां हस्तांतरित होने से रोकना लेकिन आदिवासी जमीन का बड़े पैमाने पर गैरकानूनी हस्तांतरण जारी है. सरकार आंकड़ा बताता है कि झारखंड में आदिवासी जमीन हस्तांतरण से संबंधित मामलों की बाढ़ सी आ गई. इसको समझने के लिए एक उदाहरण काफी है. एसएआर कोर्ट वर्ष 2001-02 तक 85,777.22 एकड़ जमीन से संबंधित कुल 60,464 मामले दर्ज किये गये थे. आज देशभर में बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीन गैर-कानूनी तरीके से गैर-आदिवासियों को हस्तांतरिक की जा रही है, जिसमें बड़े पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी एवं राजनेता शामिल हैं.
आदिवासियों के अभिव्यक्ति की आजादी को कुचला जाता है. झारखण्ड में विस्थापन के विरोध में लोकतंत्रिक तरीके से लड़ रहे 5,000 आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमा किया गया एवं पुलिस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया. इसके अलावा अपनी जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों को बचाने हेतु अपने गांव के मुहाने पर ‘‘पत्थलगड़ी” करने वाले 11,109 आदिवासियों के उपर देशद्रोह का मुकदमा किया गया. यह आजाद भारत के इतिहास की पहली घटना है, जहां एक साथ इतने लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा किया गया.
आजादी के विगत 75 वर्षों के अंदर राष्ट्रहित, जनहित, प्रगति, विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर आदिवासियों को उनकी पुरखौती जमीन, इलका एवं प्राकृतिक संसाधनों से विस्थापित किया गया. आदिवासियों के विकास एवं कल्याण के नाम पर आवंटित राशि का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग किया गया. नक्सलियों को खत्म करने के नाम पर हजारों निर्दोष आदिवासियों की हत्या, बलात्कार एवं यातना हुईं. आदिवासियों के लिए सबसे दुर्भाग्य बात यह है कि उनके संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों का अनुपालन, सुरक्षा एवं संरक्षण देने के बजाय देश के राष्ट्रपति, अनुसूचित राज्यों के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री सिर्फ मूकदर्शक बने रहे.
लेखक: ग्लैडसन डुंगडुंग, सामाजिक कार्यकर्ता, झारखंड।

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