भारत के आदिवासी क्यों नहीं मनाते हैं नया साल, अपने वीर शहीदों को देते हैं श्रद्धांजलि


अगर आप आदिवासी समुदाय  से आते  हैं और उनके परम्परा , संस्कृति, संघर्ष और बलिदानों के थोडी सी सहानुभूति रखते हैं तो आपको इतिहास के इन प्रमुख तारीखों के दिन क्या हुआ था ? इसे जानने का आप सभी का पूरा अधिकार है, यह अधिकार ही नहीं बल्कि आप, हम, सब के लिए साहसिक एवं प्रेरणादायक स्रोत हैं.

याद_रहे. . .  1, 2, 6, 9 जनवरी आदिवासी समुदाय का मातम (शोक ) दिवस है. किसी प्रकार का नया  साल के ज़श्न में पिकनिक अथवा खुशियां मनाकर खुद अपनी आदिवासियत का मजाक न बनाएं. आए इतिहास के उन तारीखों पर नजर डालें जो  हमें याद दिलाता है कि आदिवासी समाज संघर्ष, बलिदान एवं त्याग का प्रतिक बन गए हैं, जिससे ऊर्जा एवं प्रेरणा मिलती हैं.

 खरसावां गोलीकांड: - 1 जनवरी 1948 : खरसावां गोलीकाण्ड,  देश के आजाद होने के ठीक साढे़ चार माह बाद आजाद भारत का सबसे बडा़ नरसंहार हुआ. जो जालियां वाला बाग से भी विभस्त एवं क्रूर था , जिसमें असंख्य निर्दोष आदिवासी  पुलिस फायरिंग में मारे गये थे. इस भयानक गोलीकांड का मकसद यह था कि ‘खरसावां रियासत’ को ओडिसा  राज्य मे विलय करते हुए स्थानीय आंदोलनकारियों को रोका जाए. उस समय के बिहार राज्य के आदिवासी नहीं चाहते थे कि ‘खरसावां रियासत’ ओड़िसा का हिस्सा बने, उन दिनो तीनों रियासतों(मयूरभंज रियासत ‘सरायकेला’ और ‘खरसावां रियासत’) के आदिवासी एक अलग आदिवासी राज्य की मांग कर रहे थे. इसी को लेकर एक सभा होने वाली थी, इस सभा में हिस्सा लेने के लिए जमशेदपुर, रांची, सिमडेगा, खूंटी, तमाड़, चाईबासा और दूरदराज के इलाके से आदिवासी आंदोलनकारी खरसावां पहुंच चुके थे.

इस आंदोलन को लेकर ओडिसा सरकार काफी चौकस थी, खरसावां हाट उस दिन ‘ओडिसा मिलिट्री पुलिस’ का छावनी बन गया था. खरसावां विलय के विरोध में आदिवासी जमा हो चुके थे.

खरसावां हाट में भीड़ इक्कठा हो चुका था और जयपाल सिंह मुंडा के नहीं आने पर भीड़ का धैर्य जवाब दे चुका था. यहां तक कि कुछ आंदोलनकारी आक्रोशित भी थे. पुलिस किसी भी तरीके से भीड़ को रोकना चाहती थी लेकिन अचानक से ओड़िसा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग करना शुरू कर दिया, निहत्थे आदिवासियों पर फायरिंग का आदेश किसने दिया, क्यों दिया यह जांच का विषय है एवम इसकी पड़ताल होनी चाहिए थी.

फायरिंग की वजह से आदिवासी कटे पेड़ की तरह गिरने लगे. कोई ज़मीन पर लेट गए तो कुछ पेड़ों के पीछे छुपकर अपनी जान बचाने लगे. खरसावां हाट में उस दिन असंख्य आदिवासी शहीद हुए.

1 जनवरी 1838: सेरेंगसिया वीर सपूतों  को फांसी दी गई:-

 1833 के बाद कोल-विद्रोह तो रुक गया लेकिन अंग्रेज़ अपनी हरकतों से बाज नहीं आए थे.उन्होंने फ़िर से पुलिस बल की मदद से 1837 तक सिंहभूम के कई सारे गाँव को अपने अधीन कर लिया. यह देख फ़िर से विद्रोह शुरू हुआ और इसी विद्रोह में पोटो हो शामिल होते हैं और यहीं से शुरू होती है - सेरेंगसिया घाटी की एक अलग दास्तान. पोटो हो के नेतृत्व में आसपास के लगभग बीसियों पीड़ों के लोग अंग्रेज़ों के खिलाफ़ इस विद्रोह में शामिल होते हैं. अंग्रेज़ बार-बार हार रहे थे. स्वाभाविक है इससे आन्दोलनकारी 'हो' लड़ाकों का  हौसला बढ़ता जा रहा था.उधर विल्किंसन आंदोलन को दबाने के लिए कैप्टन आर्मस्ट्रॉन्ग के नेतृत्व में सैंकड़ों अंग्रेज़ सिपाहियों और तोपों के साथ 'हो' लोगों के साथ युद्ध के लिए रवाना करता है. लेकिन पोटो हो के गुप्तचर उन्हें इसकी ख़बर पहले ही दे चुके थे. इसलिए वे पहले से ही तैयार थे इसका फल यह हुआ कि वे सेरेंगसिया घाटी से अंग्रेज़ों को मार भगाते हैं. सच कहें तो यह हो लड़ाकों के द्वारा लड़ा जाने वाला एक प्रकार का गुरिल्ला युद्ध था जिसमें विजय सेरेंगसिया के वीरों की ही होती है। इस युद्ध में अंग्रेज़ों को बहुत क्षति होती है और इसकी फलश्रुति होती है कि अंग्रेज़ 20 नवंबर 1837 को राजाबासा में आक्रमण कर पूरे गाँव को जला देते हैं. इस गाँव से छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया, जिसमें पोटो हो के पिता भी थे. आसपास के और भी कई गाँवों को जलाया गया, एवं वहाँ मौजूद पशुओं को भी मार दिया गया. बहुत खोज़बीन के बाद 8 दिसंबर को पोटो हो को सेरेंगसिया गाँव से गिरफ़्तार किया गया.  उसके बाद उनके सभी साथियों को भी धीरे-धीरे कर गिरफ़्तार कर लिया गया. 1 जनवरी को अंग्रेजों ने सेरेंगसिया के वीर शहीद पोटो हो, नारा हो, बडा़य हो को  जगन्नाथपुर में डाक बंगला परिसर में बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी थी. 2 जनवरी_1838: सेरेंगसिया, 2 जनवरी की सुबह बोडे़या और पांडुवा को सेरेंगसिया गांव के मुण्डासाई मिडिल स्कूल टोला के बगल में लोगों की उपस्थिति में पीपल के पेड़ पर फांसी दी गयी थी.


कलिंग शहादत दिवस : -  2 जनवरी 2006 : कलिंगा शहादत दिवस  मनाया जाता हैं. 2 जनवरी 2006 को ओडिशा के जाजपुर जिले के कलिंग नगर के अंबगड़िया गांव में टाटा स्टील के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विरोध कर रहे 14 निर्दोष आदिवासी किसानों की पुलिस द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई. उनके शरीर के अंगों को काटकर लोगों में दहशत का माहौल बनाने की नीयत से घरों के सामने फेंक दिया गया था, इनमे 3 महिलाएं भी थी.  इस हृदयविदारक घटना ने देशभर में आदिवासी अधिकारों और भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दों को उजागर किया. अपनी भूमि और आजीविका की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे इन आदिवासियों को न केवल हिंसा का सामना करना पड़ा, बल्कि कई परिवार अपनी घरेलू भूमि से विस्थापित हो गए.

 गाया मुण्डा, सांडे मुण्डा, सुखराम  मुण्डा का शहादत  दिवस:-  6 जनवरी  : एटकेडीह खूंटी, गाया मुण्डा,सांड़े मुण्डा, सुखराम मुण्डा की शहादत हुई. गया मुंडा धरती आबा बिरसा मुंडा के प्रमुख सेनापति थे, जब पोड़ाहाट के जंगलों में अंग्रेज सिपाही बिरसा मुंडा की तलास कर रहे थे तब गया मुंडा अलग अलग इलाकों मे अंग्रेजो, साहूकारों, सुधखोरो के खिलाफ बैठकी करते थे तथा आगे की कार्य योजनाओं को बनाते थे, इसी क्रम मे 5 जनवरी के दिन बैठकी की खबर अंग्रेजो को मिलने के कारण गया मुंडा एवं अन्य वीर मुंडाओं का सामना अंग्रेजो से हुआ. युद्ध भी हुआ जिसमे अंग्रेजो को जान बचा कर भागना पड़ा. इसके अगले ही दिन अर्थात 6 जनवरी को अंग्रेजो द्वारा गया मुंडा को चारो तरफ से घेर लिया गया, अंग्रेजो से युद्ध भी हुआ, अंग्रेज आधुनिक हथियारों से लड़ रहे थे वही गया मुंडा पारंपरिक हथियारों से अंग्रेजी गोलियों का जवाब दे रहे थे, गया मुंडा को कई गोलियां लगी उसी हालत में उन्हे पकड़ लिया गया. गया मुंडा और उनके परिवार के सदस्यों ने इस माटी के खातिर, अबुआ दिसोम आबुआ राज के खातिर अपनी शहादत दी.

9 जनवरी : डोम्बारी बुरु गोलीकांड :-  धरती आबा बिरसा मुंडा ने 24 दिसंबर, 1899 को 'उलगुलान' का एलान कर दिया. घोषणा कर दी गई कि जल, जंगल, जमीन पर हमारा हक है, क्योंकि ये हमारा राज है. जनवरी 1900 तक पूरे मुंडा दिसोम में उलगुलान की चिंगारी फैल गई.

9 जनवरी 1900 को हजारों मुंडा तीर-धनुष और परंपरागत हथियारों के साथ डोम्बारी बुरू पहाड़ी पर इकट्ठा हुए. इधर देश के गद्दारों ने अंग्रेजी पुलिस तक मुंडाओं के इकट्ठा होने की खबर पहले ही पहुंचा दी थी. अंग्रेजों की पुलिस और सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ। हजारों की संख्या में आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े। अंग्रेज बंदूकें और तोप चला रहे थे और बिरसा मुंडा और उनके समर्थक तीर बरसा रहे थे. डोंबारी बुरू के इस युद्ध में हजारों आदिवासी बेरहमी से मार दिए गए. स्टेट्समैन के 25 जनवरी, 1900 के अंक में छपी खबर के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे.  यह आँकड़ा अनुमानित था जबकि शहीद पुरखो की संख्या इससे ज्यादा हजारों में थी.  इस नरसंहार से डोंबारी पहाड़ी खून से रंग गई थी, लाशें बिछ गई थी और शहीदों के खून से डोंबारी पहाड़ी के पास स्थित तजना नदी का पानी लाल हो गया था. 

डोंबारी बुरु गोलीकांड इतिहास के पन्नों की एक विभत्स घटना है. झारखण्डी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेज़ शोषकों से लड़ाई लड़ते हुए झारखण्डी माटी के हमारे असंख्य वीर पुरुखों ने बलिदान दिया था.

भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है तथा आप भी स्वतंत्र है, आप अपनी इच्छा मुताबिक खुशियां मना सकते है, पिकनिक मना सकते है, एक दूसरे के साथ खुशियां बांट सकते है, शुभकामनाएं दे सकते है. लेकिन इस बात इस  पर ग़ौर करें की यह आजादी हमे खैरात में नही मिली है, किसी ने इस आजादी को हमें भिख में नही दी है, इस आजादी के लिए सैंकड़ों वर्षों तक आदिवासी पुरखो ने कुर्बानियां दी, शहादते  दी है. युद्ध लड़े है तब यह  आजादी आपके और हमारे पास आई है.

क्या अब भी इतना कुछ जानने के बाद भी आप 1, 2, 6, 9 जनवरी को नववर्ष की खुशियां व पिकनिक मनाना  पसंद करेंगे एवं वीर शहीदों के शहादत को भूल जायेंगे . . . ? ? ? यह आप पर निर्भर करता है आखिर आप भी स्वतंत्र राष्ट्र के एक स्वतंत्र आदिवासी है.

वीर शहीद आदिवासी पुरखो के शहादत पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक, आदिवासी परिचर्चा।

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