आदिवासी साहित्य: हो भाषा साहित्य के लेखन में दमयंती सिंकु का योगदान


 डां. दमयंती सिंकु का जन्म झारखंड राज्य के पश्चिम सिंहभूम जिले के खैरपाल गांव में 10 दिसंबर, 1961 को हुआ. इनके पिता राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी थे. दमयंती सिंधु अपने पढ़ाई  एवं  शोधकार्य पुरा करने के बाद वर्तमान में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय में "हो" भाषा के सहायक व्याख्याता हैं. डॉ सिंकु 1998 से लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं. इनकी प्रथम पुस्तक हो- हिन्दी (कजि-बुरु) शब्दकोश 2007 में प्रकाशित हुई. इनके द्वारा लिखित अन्य पुस्तकें हैं -  सिंहभूम के शहीद लड़ाका हो- 2008,पुति रेया सेतेंग डबुरा को- 2008, हो दुरंग सिसिर( हिन्दी अनुवाद सहित) - 2013, हो भाषा सिखे - 2013,माराङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा नाटक ( हिंदी अनुवाद सहित)- 2013, एवं हो भाषा के साहित्यकार - 2017 में प्रकाशित हुई. डॉ दमयंती सिंकु की रचनाओं में गद्य एवं पद्य से संबंधित निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहें हैं. सितंबर- नवंबर,2007 में अखड़ा पत्रिका में छपी इनकी रचना " झारखंड में आदिवासी भाषाओं की उपेक्षा" पर प्रकाश डालते हुए यहां की भाषा पर विशेष चर्चा है. आदिवासी जन परिषद, रांची द्वारा प्रकाशित प्राकृतिक विरासत पत्रिका कमश: 2013 से 2014 एवं 2016 में इनकी रचना " धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा" एवं " बसंत रेको मनातिंग बाद पारोब" पर लेख छपा है.  इसमें उन्होंने भगवान बिरसा के संघर्षों का उल्लेख किया है. डॉ दमयंती ने लेखन के माध्यम से " हो आदिवासी में करम पर्व " पर भी विस्तार से प्रकाश डाला है. बसंत का जिक्र होने मात्र से सारी सृष्टि में जोश,उमंग, और आनन्दमय हो जाता है. धरती एक नई नवेली दुल्हन की तरह सज जाती है. ऐसे वातावरण में सरहुल पर्व का आगमन होता है. बच्चे, युवक -युवतियों और बुजुर्ग में ऊर्जा का संचार हो जाता है. सरहुल का पर्व बहुत सुंदर ढंग से लेखिका ने गढ़ है. प्राकृतिक पर्व करमा आदिवासियों एवं सदानों का मुख्य पर्व है. उनकी रुचि नाटक, कविता, कहानी लेखन में है. उनकी कविता  "हो दुर्ग हिसिर" में आबुआ झारखंड में झारखंड की सुन्दरता,अकूत धन- सम्पत्ति का जिक्र हुआ है. " किसिम- किसिम बा जो ना// रोकोम- रोकोम कजि जगर ना. इस प्रकार यहां रहने वालों की विभिन्न भाषाएं वेश- भूषा और पर्व त्यौहार है. पर्व त्योहार में सभी की सहभागिता नाच- गान में होती है:-

जोनोम लेनाय वीर बिरसा / तुर लेनाय कोल लको बोदरा / बइ लेडाय हो बिरसा, ना / आमिन लेडाय टेबो बुरु हांगिना / बइ लेडा किङ लिपि तबु / ओल लेडा किङ पुति तबु। यहां कवियत्री बतातीं है कि इस सुंदर धरती पर हमें अंग्रेजों के चुंगल से छुड़ाने वाले वीर सपूत बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था. इन्होंने हमें राह दिखायी. इनकी एक अन्य कविता " दुलाड़ गातिञ" हृदय के दुख दर्द को छू लेती है. भाषा के साथ-साथ आदिवासी सरोकारों के लेखन की प्रक्रिया में डां. दमयंती ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. उनका लेखन और अध्यापन दोनों ही विशिष्टताओं से भरे हैं. वे अपने आसपास के घटनाओं को सहज संवाद के रूप में ढालने की पक्षधर रहीं हैं,  और यही उनकेे लेखन में साफ़ दिखाई पड़ता है.  डॉ दमयंती सिंकु को अपने लेखन अतुलनीय योगदान के लिए विश्व आदिवासी दिवस  पर पद्मश्री  डॉ रामदयाल मुंडा साहित्यकार पुरस्कार ( 2012) एवं आदिवासी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के तृतीय महासम्मेलन में अखड़ा सम्मान (2013) दिया जा चुका है. 

संकलन: कालीदास मुर्मू संपादक आदिवासी परिचर्चा। 

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