होड़ोपैथी आदिवासी की परम्परागत औषधालय


सघन वनों से आच्छादित होने के कारण ही हमारे प्रदेश का नाम झारखंड रखा गया है, ऐसा इतिहासकारों का मानना है, परंतु वास्तविकता में देखा जाए तो झारखंड का अर्थ है, भविष्य प्रदेश जहां औषधियों से भरा पड़ा हुआ हूं, यह प्रदेश पादप विविधता का धनी है. वर्तमान समय में 3000 से अधिक प्रजाति के पादप झारखंड में पाए जाते हैं. यह सभी औषधीय गुना से परिपूर्ण है. पादप में विशेष गुण यह है कि अलग-अलग अंग अलग-अलग रोगों की दवाएं है. इसमें कोई पादप तो  पांच - दस या अधिक रोगों की चिकित्सा में आते हैं. पादपों के औषधीय ज्ञान के बारे में आदिवासियों से अधिक कोई नहीं जानता, उनके पूर्वजों इस ज्ञान को कुछ तो अन्त: बोध से पाया. कुछ को पशु पक्षियों से सीखा, अपने या दूसरे मनुष्य में प्रयोग किया, सफल होने पर याद किया तथा अपनी संतान को मौखिक रूप से दिया. जो पीढ़ी दर पीढ़ी आदिवासियों के प्रथा में परंपराएं हैं.
किंतु लोक कथाएं कहती है, स्वयं सृष्टिकर्ता ने दनतरी नामक आदिवासी युवक को पादपों का ज्ञान राम के रूप में दिया. यह एक लंबी कथा है. इसी वरदान की बदौलत आज भी आदिवासी समुदाय बचा हुआ है. युगों पुराना अनुभव ही इसका वैज्ञानिक आधार है. उनके इस औषध ज्ञान को ही औषध कहा जाता है तथा अंग्रेजी में एथनोमेडिसन है. 
देश में अंग्रेजी दवाई दो ईसाई मिशनरियों ने लाया वह भी अपने सेवन के लिए. अंग्रेजी शासन काल में अंग्रेजी दवा को संरक्षण मिला. किंतु ग्रामीण स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार नहीं हुआ. सरकार तथा ईसाई मिशनरियों ने अस्पताल खोलने तक ही सीमित रखा. जात के बाद तो ऐसा लगा कि स्वास्थ्य के लिए अंग्रेजी दवा को छोड़कर अन्य कोई कारगर प्रणाली ही नहीं है. परंपरागत आदिवासी जुड़ी बूटी जो सदियों से चली आ रहा था, उससे अब वैज्ञानिक आकर सीधा खारिज कर  दिया गया. 
आदिवासी जुड़े बुटी ( होड़ोपैथी) का इतिहास:- जैसे कि पहले ही कहा गया है इसका मूल्य उत्पत्ति कहें तो, मानव कि सृष्टि के साथ ही हुआ है. भारत में यह विकसित रूप में, मोहन जोदड़ो से  मिलती है. यह तथ्य पूरातत्वविद भी मानते हैं, कि होड़ोपैथी की उत्पत्ति मानव की विकास के साथ ही हुई है. इन विषम परिस्थितियों में भी इस अवसर ज्ञान को राज आदिवासी समुदाय ने संजो कर रखा है. 
आजादी के बाद जंगलों के विनाश और आजादी के 75 साल बाद भी अंग्रेजी दवा थोपने का प्रयास असफल रहा है. यदि आयुष को भी तो पास जाएगा तो उसका भी वही हश्र होगा. अधिकांश ग्रामीण   आदिवासी इससे मुंह मोड़ लेंगे. 
वन औषधों की अपार भंडार है. आवश्यक है, उन्हें पहचानकर उचित रोगों में उपयोग एवं संरक्षण की जरूरत है. वर्तमान में ऐसे औषधियों को दस्तावेजजीकरण किया जाना आवश्यक है, अगर ऐसा किया जाए तो पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को संरक्षण मिलेगा और जंगलों सुदूर देहातों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य की उनके विश्वास की पद्धति में चिकित्सा सुविधा मिलेगी.

कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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