नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने तत्काल सुनवाई की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है. नए नियम के तहत अब अत्यंत आवश्यक मामले, जिनमें नियमित सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया का इंतजार नहीं किया जा सकता, उनका उल्लेख केवल मुख्य न्यायाधीश के समक्ष ही किया जा सकेगा. यह नियम तब भी प्रभावी रहेगा जब मुख्य न्यायाधीश किसी संविधान पीठ की अध्यक्षता करने में व्यस्त हों. न्यायालय के इस कदम का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता लाना और तत्काल सुनवाई के मामलों के लिए एक केंद्रीय व्यवस्था सुनिश्चित करना है.
छह अप्रैल को जारी आधिकारिक परिपत्र में स्पष्ट किया गया है कि अत्यंत आवश्यक मामलों का उल्लेख अब केवल अदालत संख्या-1 (मुख्य न्यायाधीश की अदालत) के समक्ष ही करने की अनुमति है. परिपत्र में जोर देकर कहा गया है कि भले ही प्रधान न्यायाधीश किसी भी विशेष पीठ या संविधान पीठ का हिस्सा हों, वकीलों को ऐसे मामलों के लिए किसी अन्य पीठ के सामने जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी. यह निर्देश 29 नवंबर, 2025 के पिछले परिपत्र के संदर्भ में जारी किया गया है, ताकि सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में होने वाले किसी भी भ्रम को दूर किया जा सके. बता दें कि इस प्रशासनिक बदलाव के बीच, मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में न्यायिक बुनियादी ढांचे की मजबूती पर भी अपने विचार साझा किए थे. तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि देश भर में न्यायिक परिसरों का विस्तार हो रहा है और सभी राज्य सरकारें अब यह स्वीकार कर रही हैं कि न्यायिक ढांचे को मजबूत करना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अत्यंत आवश्यक कार्य है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान निर्माताओं का न्याय तक पहुंच के सिद्धांत में अटूट विश्वास था, और प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय की स्थापना इसी संवैधानिक दायित्व का हिस्सा है. मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, यह केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि भारतीय गणतंत्र की एक गंभीर प्रतिबद्धता है.
पुरानी व्यवस्था में बदलाव किए गए:-
इससे पहले की व्यवस्था के अनुसार, यदि मुख्य न्यायाधीश उपलब्ध नहीं होते थे या किसी संविधान पीठ की सुनवाई में व्यस्त रहते थे, तो अत्यावश्यक मामलों के उल्लेख के लिए उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ जज (सीनियर मोस्ट जज) के पास जाने का प्रावधान था. वकीलों को तत्काल राहत पाने के लिए वरिष्ठ जजों की पीठ के सामने अपनी अर्जी रखने की अनुमति थी हालांकि, नए सर्कुलर ने अब इस प्रक्रिया को पूरी तरह मुख्य न्यायाधीश की पीठ तक ही सीमित कर दिया है.
संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।

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