अनुसूचित क्षेत्र और आदिवासी अधिकारों का संरक्षण कैसे होगा ?


 भारत के आजादी के विगत 75 वर्षों के अंदर देश के ‘‘अनुसूचित क्षेत्र’’ और वहां निवास करने वाले ‘‘आदिवासियों के अधिकार’’ सबसे ज्यादा असुरक्षित हुए हैं क्योंकि उक्त क्षेत्र में बाहरी जनसंख्या का बड़े पैमाने पर आगमन एवं बसाहट ने वहां के ‘‘डेमोग्राफी’’ को बिगाड़ दिया है. फलस्वरूप, आदिवासियों की जनसंख्या मंे भारी गिरावट हुई है.

आजीविका के अवसरों की खोज हेतु इस क्षेत्र में आयी बाहरी जनसंख्या ने आदिवासियों की जमीन गैर-कानूनी तरीके से हथिया लिया है. इसके अलावा जंगल, पहाड़, जलस्रोत एवं खनिज सम्पदा का बड़े पैमाने पर दोहन भी बाहरी जनसंख्या की ही देन है.

अनुसूचित क्षेत्र पर कब्जा करने हेतु बाहरी जनसंख्या ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए)(बी)(सी)(डी)(ई) एवं (जी) का भरपूर उपयोग किया है. जिसके तहत देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी के साथ देश के किसी भी क्षेत्र में स्वतंत्ररूप से विचरण करने, रहने, बसने, रोजगार एवं व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. हालांकि अनुसूचित क्षेत्र के लिए यह अधूरा सच है क्योंकि इसके संरक्षण एवं आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा हेतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(5) एवं (6) के अलावा पाँचवीं अनुसूची के तहत विशेष प्रावधान किये गये हैं. 

 लेकिन आदिवासियों के संवैधानिक अभिभावक भारत के राष्ट्रपति, अनुसूचित क्षेत्र के राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं जिले के उपायुक्तों ने अनुसूचित क्षेत्र एवं वहां के आदिवासियों के अधिकारों के अनुपालन, सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु अपने संवैधानिक कर्तव्यों का अबतक पालन ही नहीं किया है, बल्कि अनुसूचित क्षेत्र के उपायुक्तों को जिन्हें आदिवासी जमीन की सुरक्षा की जिम्मेवारी दी गई है, वे स्वयं गैर-कानूनी जमीन हस्तांतरण में शामिल पाये गये हैं.

 ‘‘अनुसूचित क्षेत्र’’ और वहां के आदिवासियों की जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधन के आलावा राजनीतिक अधिकारों को हासिल करने हेतु बाहरी लोगों ने हमेशा से ही ‘‘जनसंख्या’’ को आधार बनाया है जबकि ‘‘अनुसूचित क्षेत्र’’ की स्थापना के मूल में ‘‘जनसंख्या’’ नहीं है बल्कि इसके ऐतिहासिक कारण हैं, जिसे लोग समझने को तैयार नहीं हैं. 

 ये इलाके ऐतिहासिक रूप से आदिवासियों के हैं, जहां ब्रिटिश हुकूमत के समय से ही अलग तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था चलाया जा रहा है. बावजूद इसके बाहरी जनसंख्या हर हाल में यहां की जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों को पूर्णरूप से हथियाना चाहता है. इसके अलावा ‘‘जनसंख्या’’ को आधार बनाकर राजनीतिक अधिकार पर भी काबिज है.                            

अब यहां सवाल उठता है कि क्या ‘‘अनुसूचित क्षेत्र’’ और वहां के ‘‘आदिवासियों का अधिकार’’ बच पायेगा? क्या अनुसूचित क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासियों की जमीन, इलाका एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो पायेगा? क्या। राज्य सरकार आदिवासियों को सुरक्षा दे पायेगा? 


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 अनुसूचित क्षेत्र के समस्या का मूल जड़ है लेकिन इसी में समाधान भी निहित है. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए)(बी)(सी)(डी)(ई) एवं (जी) का उपयोग करते हुए बाहरी जनसंख्या का यहां बड़े पैमाने पर प्रवाह एवं बसाहट हो रहा है, जो यहां के समस्याओं का मूल जड़ है तो वहीं 19 उप-अनुच्छेद (5) एवं (6) के तहत कानून बनाकर बाहरी जनसंख्या के ‘‘अनुसूचित क्षेत्र’’ में आगमन, बसाहट एवं नौकरी, पेशा व व्यवसाय पर ‘‘उचित रोक’’ लगाना इसका उचित समाधान है.

संविधान के अनुच्छेद 19(5) एवं (6) में स्पष्ट उल्लेखित है कि सामान्य जनसंख्या या अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) के हितों की सुरक्षा हेतु सरकार कानून बनाकर बाहरी जनसंख्या के विचरण, बसाहट एवं व्यवसाय पर ‘‘उचित प्रतिबंध’’ लगा सकती है, जो सरकार का संवैधानिक अधिकार है. 

 इसके अलावा भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची के पैरा - 5 के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों की गैर-कानूनी जमीन हस्तांतरण पर रोक लगाने, साहूकारों के कारोबार पर अंकुश लगाने एवं आदिवासियों को कानूनीरूप संरक्षण देने का संवैधानिक जिम्मेवारी राज्यपाल की है.

 इससे स्पष्ट है कि आदिवासियों के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति, अनुसूचित क्षेत्र से संबंधित राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जिले के उपायुक्त एवं आदिवासी मामलों से जुड़े मंत्री एवं नौकरशाह अनुसूचित क्षेत्र एवं वहां निवास करने वाले आदिवासियों को सुरक्षा प्रदान नहीं करना चाहते हैं.

लेखक : ग्लैडसन डुंगडुंग, सामाजिक कार्यकर्ता, झारखंड।

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