जनजातीय उन्नयन में 15,421.97 करोड़ रुपये से समावेशी विकास की नई तस्वीर बनेगी

 


वित्तीय वर्ष 2026–27 में जनजातीय उन्नयन के लिए 15,421.97 करोड़ रुपये का प्रावधान भारत के समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जनजातीय समुदाय सदियों से देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संरचना का अभिन्न हिस्सा रहे हैं, किंतु ऐतिहासिक उपेक्षा, भौगोलिक दुर्गमता और संसाधनों की कमी के कारण वे विकास की मुख्यधारा से अपेक्षित रूप से नहीं जुड़ सके। इस पृष्ठभूमि में यह बजटीय निवेश केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि जनजातीय समाज को आत्मनिर्भर, सशक्त और सम्मानजनक जीवन प्रदान करने की एक समग्र नीति का संकेत देता है।

जनजातीय समावेशी विकास की अवधारणा बहुआयामी है। इसका उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, आवास, बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल पहुंच और सांस्कृतिक संरक्षण को एक साथ सुदृढ़ करना है। वित्तीय वर्ष 2026–27 का व्यय इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है, ताकि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और क्षेत्रीय व सामाजिक असमानताओं को कम किया जा सके।

शिक्षा को जनजातीय उन्नयन का सबसे सशक्त माध्यम माना गया है। बजटीय प्रावधानों के अंतर्गत एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों, छात्रावासों, छात्रवृत्तियों और डिजिटल शिक्षा के विस्तार पर विशेष बल दिया गया है। इससे दूरस्थ और वनवासी क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होगी, विद्यालय छोड़ने की दर में कमी आएगी और उच्च शिक्षा तथा कौशल आधारित प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं को रोजगारोन्मुख बनाया जा सकेगा। दीर्घकाल में यह मानव संसाधन विकास को मजबूत करेगा।

स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में भी यह निवेश निर्णायक भूमिका निभाएगा। जनजातीय इलाकों में कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर तथा स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच एक बड़ी चुनौती रही है। प्रस्तावित व्यय से प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किया जाएगा, मोबाइल चिकित्सा इकाइयों और टेली-मेडिसिन सेवाओं का विस्तार होगा तथा पोषण आधारित कार्यक्रमों को प्रभावी बनाया जाएगा। स्वस्थ जनजातीय समाज ही सामाजिक और आर्थिक प्रगति की ठोस नींव रख सकता है।

आर्थिक सशक्तिकरण जनजातीय समावेशी विकास का केंद्रीय आधार है। इस बजट के माध्यम से वन आधारित आजीविकाओं, विशेषकर लघु वनोपज के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया जाएगा। स्वयं सहायता समूहों, सहकारी संस्थाओं और जनजातीय उद्यमों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी। कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और हस्तशिल्प जैसे पारंपरिक कार्यों को आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़कर आय के नए अवसर सृजित किए जाएंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा और पलायन में कमी आएगी।

बुनियादी ढांचे के विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया है। सड़क, बिजली, पेयजल, आवास और संचार सुविधाओं के विस्तार से दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा। आवास योजनाओं के माध्यम से सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था होगी, जबकि सड़क और संपर्क परियोजनाएं आर्थिक गतिविधियों को गति देंगी। ऊर्जा और जल आपूर्ति की बेहतर व्यवस्था जीवन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करेगी।

डिजिटल समावेशन इस बजट की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट कनेक्टिविटी और ऑनलाइन सेवाओं की पहुंच से जनजातीय समुदायों को सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिलेगा। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ेगी और बिचौलियों की भूमिका कम होगी। इससे शासन और नागरिकों के बीच विश्वास मजबूत होगा तथा प्रशासनिक दक्षता में सुधार आएगा।

विकास के साथ-साथ जनजातीय संस्कृति, भाषा और परंपराओं का संरक्षण भी इस निवेश का अहम पक्ष है। जनजातीय कला, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के प्रयास किए जाएंगे, साथ ही परंपरागत स्वशासन और संवैधानिक अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर रहेगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में जनजातीय पहचान और स्वाभिमान सुरक्षित रहें।

15,421.97 करोड़ रुपये के इस व्यय से करोड़ों जनजातीय नागरिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार, आय और रोजगार के अवसरों में वृद्धि तथा सामाजिक भागीदारी के विस्तार जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। दीर्घकाल में यह पहल न केवल जनजातीय समाज को सशक्त बनाएगी, बल्कि देश के संतुलित और टिकाऊ विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।

समग्र रूप से देखा जाए तो वित्तीय वर्ष 2026–27 में जनजातीय उन्नयन हेतु किया गया यह बजटीय प्रावधान सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक मजबूत कदम है। यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, स्थानीय सहभागिता और पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाती है, तो यह निवेश जनजातीय समुदायों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने में सफल होगा और भारत के विकास पथ को अधिक न्यायसंगत व समावेशी बनाएगा।

संकलन: कालीदास मुर्मू, संपादक आदिवासी परिचर्चा।




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